Indira Ekadashi Vrat Katha : इंदिरा एकादशी व्रत से कैसे हुआ राजा इंद्रसेन  के पितरों का उद्धार? पढ़े रोचक कथा

punjabkesari.in Monday, Oct 05, 2026 - 09:39 AM (IST)

Indira Ekadashi Vrat Katha : हिंदू धर्म में इंदिरा एकादशी का बहुत खास महत्व है। यह एकादशी पितृ पक्ष के दौरान आती है और इसे पितरों के उद्धार से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान से व्रत रखने से भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने से पूर्वजों को शांति और मुक्ति की प्राप्ति होती है। इंदिरा एकादशी की महिमा से जुड़ी एक पौराणिक कथा राजा इंद्रसेन की भी है। कहा जाता है कि राजा को स्वप्न में अपने पितरों की ऐसी स्थिति के बारे में पता चला, जिसके बाद उन्होंने उनके उद्धार के लिए इंदिरा एकादशी का व्रत किया। आखिर राजा इंद्रसेन ने यह व्रत किस तरह रखा और इससे उनके पितरों को कैसे मुक्ति मिली? तो आइए जानते हैं इंदिरा एकादशी से जुड़ी रोचक और धार्मिक कथा के बारे में-

Indira Ekadashi Vrat Katha

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया। सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके राज्य के सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? 

देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहां यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। हे महर्षि! आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो। एक बार मैं ब्रह्मलोक से यमलोक को गया था, तब मैंने यमराज की सभा में तुम्हारे पिता को बैठे देखा। तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, मगर एकादशी के व्रत के बिगड़ जाने के कारण ये यमलोक को गए है। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है। राजा ने उत्सुकता से पूछा क्या संदेश है महर्षि? कृपा कर यथाशीघ्र कहें। तब नारद जी ने कहा कि है कि पूर्व जन्म में किसी बुरे कार्म के कारण ही मुझे ये यमलोक मिला है। 

Indira Ekadashi Vrat Katha

यदि मेरा पुत्र आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत करें और उस व्रत के फल को मुझे दे दे तो मेरी मुक्ति हो जाएगी। मुझे भी इस लोक से मुक्ति मिलकर स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। इतना सुनकर राजा को अपने पिता के यमलोक में पड़े होने की बात सुनकर महा दुख हुआ और उसने नारद से कहा हे नारद जी! ये तो बड़े दुख का समाचार है कि मेरे पिता यमलोक में पड़े हैं। मैं उनकी मुक्ति का उपाय अवश्य करुंगा। हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। 

फिर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातुन आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करुंगा। इस प्रकार नियमपूर्वक भगवान विष्णु के स्वरुप  शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएं और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूंघकर गौ को दें तथा इस दिन अपने पूर्वजों के नाम का दान पुण्य करें। जो भी इस दिन एकादशी का व्रत करता है या मात्र व्रत कथा ही सुन या पढ़ लेता है। उसके प्रभाव से नर्क में गए हुए पितरों का उद्धार हो जाता है। 

Indira Ekadashi Vrat Katha

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Content Editor

Sarita Thapa

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