पारिजात क्यों कहलाता है स्वर्गीय वृक्ष? जानें इसके नाम, पौराणिक कथाएं और अद्भुत मान्यताएं
punjabkesari.in Sunday, Oct 04, 2026 - 12:23 PM (IST)
Why Parijat Called Divine Tree : पारिजात भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परम्परा में विशेष स्थान रखने वाला एक अत्यंत सुंदर और सुगंधित वृक्ष है। इसे हिंदी में हरसिंगार और संस्कृत में पारिजात, शेफालिका तथा शैफाली जैसे नामों से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘निक्टैंथिस आर्बर-ट्रिस्टिस’ है। यह सामान्यत: छोटा वृक्ष या झाड़ी के रूप में विकसित होता है। इसके सफेद फूलों के बीच नारंगी रंग की नलीनुमा डंडी होती है, जो इसके फूलों को विशिष्ट और आकर्षक बनाती है। पारिजात के फूलों की सबसे अनोखी विशेषता है कि वे रात में खिलते हैं और प्रात: होते-होते स्वयं वृक्ष से झड़कर धरती पर बिखर जाते हैं। इसकी मधुर सुगंध रात के समय वातावरण को महका देती है। इसी कारण इसे अंग्रेजी में ‘नाइट-फ्लावरिंग जैस्मीन भी कहा जाता है। फूलों का रात में खिलना और सुबह धरती पर गिर जाना इसे भारतीय कल्पना, काव्य और दर्शन में सौंदर्य, विनम्रता, त्याग और क्षणभंगुरता का प्रतीक बनाने का आधार देता है।

पारिजात का पौराणिक महत्व
भारतीय पौराणिक परम्परा में पारिजात को स्वर्गीय वृक्ष माना गया है। समुद्र मंथन से उत्पन्न दिव्य वस्तुओं और रत्नों से जुड़ी कथाओं में पारिजात का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुए पारिजात वृक्ष को देवताओं के राजा इंद्र ने प्राप्त किया और उसे स्वर्ग के प्रसिद्ध नंदन वन में स्थापित किया गया। इस प्रकार पारिजात केवल एक वृक्ष नहीं रहा, बल्कि भारतीय धार्मिक कल्पना में स्वर्ग, दिव्यता और सौंदर्य का प्रतीक बन गया।
पारिजात का धरती पर आगमन
पारिजात के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के संबंध में भारतीय परम्परा में एक से अधिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें दो कथाएं विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
अर्जुन और माता कुंती की कथा
एक लोकप्रचलित मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में माता कुंती भगवान शिव की पूजा पारिजात के फूलों से करना चाहती थीं। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए अर्जुन स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लेकर आए और उसे पृथ्वी पर स्थापित किया। इस कथा का संबंध उत्तर प्रदेश के किंतूर क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है। यह कथा पारिजात को भक्ति, मातृभक्ति और देवपूजा से जोड़ती है।
श्रीकृष्ण, सत्यभामा और रुक्मिणी की कथा
पारिजात से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण, रुक्मिणी और सत्यभामा की कथा है। कथा के अनुसार, देवर्षि नारद ने श्रीकृष्ण को पारिजात के पुष्प भेंट किए। श्रीकृष्ण ने वे पुष्प रुक्मिणी को दे दिए। जब सत्यभामा को इसका पता चला, तो उन्होंने अपने आंगन में पारिजात वृक्ष लगाने की इच्छा व्यक्त की। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और पारिजात वृक्ष को पृथ्वी पर लाए। कथा के एक प्रचलित रूप में बताया जाता है कि पारिजात वृक्ष को पृथ्वी पर लाने को लेकर श्रीकृष्ण और इंद्र के बीच संघर्ष भी हुआ। अंतत: पारिजात पृथ्वी पर आया और श्रीकृष्ण से जुड़ी इस कथा के कारण यह वृक्ष प्रेम, सौंदर्य और दिव्य सम्पदा का प्रतीक बन गया।
देवी लक्ष्मी और पारिजात
लोकमान्यता में पारिजात का संबंध माता लक्ष्मी से भी जोड़ा जाता है। चूंकि समुद्र मंथन की कथाओं में लक्ष्मी और पारिजात दोनों का प्राकट्य बताया जाता है, इसलिए कुछ परम्पराओं में पारिजात को लक्ष्मी से संबंधित और उनका प्रिय वृक्ष माना गया है। इसी विश्वास के कारण पारिजात को घर में सुख, समृद्धि और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं और इनके अलग-अलग क्षेत्रों तथा परम्पराओं में भिन्न रूप मिलते हैं।
पारिजात के नाम और उनके अर्थ
पारिजात को भारत के विभिन्न क्षेत्रों और परम्पराओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है :
पारिजात : स्वर्गीय या दिव्य वृक्ष के अर्थ में प्रयुक्त नाम।
हरसिंगार : इसका सबसे प्रचलित हिंदी नाम।
शेफालिका / शैफाली : इसके संस्कृत नाम।
निशिगंधा : रात में सुगंध फैलाने के कारण प्रयुक्त नाम।
रजनीहार : रात्रि में सुगंध बिखेरने वाला।
दु:खहरण : लोकमान्यता में दुख दूर करने वाले वृक्ष के रूप में प्रयुक्त नाम।
पारिजात के फूलों की अनोखी परम्परा
पारिजात से जुड़ी एक विशेष धार्मिक परम्परा यह है कि इसके फूलों को सामान्यत: पेड़ से तोड़कर नहीं, बल्कि स्वयं धरती पर गिरे हुए फूलों के रूप में पूजा में उपयोग किया जाता है। भारतीय धार्मिक परम्पराओं में कई स्थानों पर गिरे हुए फूलों को पूजा के योग्य नहीं माना जाता, लेकिन पारिजात के संदर्भ में इसके स्वत: गिरे फूलों को विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। इस मान्यता में पारिजात की प्रकृति और आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता दोनों दिखाई देती हैं- वह बिना किसी आग्रह के रात में खिलता है, अपनी सुगंध फैलाता है और सुबह स्वयं धरती पर गिर जाता है।
पारिजात : सौंदर्य और त्याग का प्रतीक
पारिजात का जीवन-चक्र अपने आप में एक सुंदर संदेश देता है। यह रात के अंधकार में खिलता है, सुगंध फैलाता है और सुबह बिना किसी अहंकार के अपने फूल धरती को समर्पित कर देता है। इसी कारण पारिजात को केवल स्वर्गीय सौंदर्य का प्रतीक मानना पर्याप्त नहीं है। भारतीय काव्य और दर्शन की दृष्टि से यह विनम्रता, त्याग, समर्पण और क्षणभंगुर सौंदर्य का भी प्रतीक माना जा सकता है।
पारिजात मानो यह संदेश देता है : ‘सच्चा सौंदर्य वह है जो खिलकर स्वयं को संसार को समर्पित कर दे।’ पारिजात एक बेहद गुणकारी आयुर्वेदिक पौधा है, जिसके पत्ते, फूल और छाल कई स्वास्थ्य समस्याओं में राहत देते हैं।

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