सती के वियोग में जब रो पड़े महादेव...आज भी मौजूद हैं आंसुओं से बने दो पवित्र कुंड
punjabkesari.in Monday, Jun 15, 2026 - 09:42 AM (IST)
Shiva Temple: हिंदू धर्म में भगवान शिव को 'महादेव' कहा जाता है, जो अपने भक्तों के दुखों को हर लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब स्वयं महादेव गहरे शोक में डूब गए थे और उनके नेत्रों से निकले आंसुओं ने धरती पर दो अत्यंत पवित्र कुंडों को जन्म दिया?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन कुंडों में स्नान करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। महादेव के आंसुओं की कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष ने अपने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती इस अपमान को सह न सकी और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। सती के वियोग में महादेव इतने व्यथित हुए कि उनके नेत्रों से आंसुओं की दो बूंदें धरती पर गिरीं। इन्हीं बूंदों से दो पवित्र जलाशयों का निर्माण हुआ।

पुष्कर झील
भगवान शिव के आंसू की पहली बूंद राजस्थान के पुष्कर में गिरी थी। जहां वर्तमान समय में पुष्कर झील है। माना जाता है कि पुष्कर तीन हैं - ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर, मध्य (बूढ़ा) पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्मा जी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान विष्णु और कनिष्ठ पुष्कर के देवता रुद हैं। यह हिंदुओं के लिए एक पवित्र जल निकाय है और इस जगह पुष्कर मेला भी आयोजित किया जाता है। मेले के दौरान अपने पाप धोने के लिए हजारों तीर्थयात्री इस पवित्र झील में स्नान करने के लिए भी यहां आते हैं। आसपास के क्षेत्र विदेशी वनस्पतियों और जीवों के घर हैं, जहां कई प्रवासी पक्षी कुछ खास मौसमों में जलाशय में आते हैं। खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित यह झील राजस्थान के मुख्य पर्यटक आकर्षणों में से एक है।

कटासराज कुंड पाकिस्तान
जब भगवान शिव सती का अधजला शरीर कंधे पर रख कर विचरण कर रहे थे तो उनकी आंख से जब दूसरा आंसू टपका, उससे अमरकुंड का उदय हुआ। भगवान शिव शंकर से जुड़े प्राचीन व धरती के दूसरे नेत्र कहे जाने वाले तीर्थ श्री कटासराज धाम (पाकिस्तान) में स्थित श्री अमर कुंड है। पौराणिक काल में कटास राज का यह सरोवर कभी ‘विषकुंड’ कभी ‘अमरकुंड’ और कभी ‘अमृत कुंड’ कहलाया। नमक और कोयले के पहाड़ों के बीच पंजाब के चकवाल जिले का यह तीर्थ पूर्व में ‘चौ शैदनशाह’ और पश्चिम में ‘करियाला’ कस्बों के बीच स्थित है। महाभारत काल में अवश्य यह वीरान पहाड़ी क्षेत्र रहा होगा।
लोक मान्यता है कि इस तीर्थ के कुंड में स्नान करने से समस्त पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल हिंदू ही नहीं विभिन्न धर्मों के अनुयायी यहां स्नान के लिए आते हैं और प्रार्थना करते हैं। कटासराज का महाभारत युग से भी गहरा नाता है। माना जाता है कि पाण्डवों ने वनवासकाल के 4 साल का समय यहीं बिताया था। यहां की अद्भुत झील में असीम शक्ति है। युधिष्ठिर ने यहीं पर यक्ष को हराकर अपने भाइयों को जीवित किया था।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
