Murudeshwar Shiva Temple: चांदी के रंग में चमकता महादेव का अद्भुत रूप, 5 साल और 5 करोड़ की लागत से तैयार हुआ यह आधुनिक अजूबा
punjabkesari.in Tuesday, Aug 04, 2026 - 12:00 PM (IST)
Murudeshwar Shiva Temple: भारत की पावन धरती पर कई ऐसे शिवालय हैं, जिनका वैभव सदियों पुराना है, लेकिन कर्नाटक के तट पर स्थित मुरुदेश्वर मंदिर की छटा सबसे निराली है। तीन ओर से अरब सागर की लहरों से घिरा यह मंदिर न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि इसका इतिहास सीधे तौर पर रामायण काल और लंकापति रावण की तपस्या से जुड़ा है। यहाँ स्थापित महादेव की 123 फुट ऊँची भव्य प्रतिमा भक्तों को भक्ति के एक अलग ही संसार में ले जाती है। आइए, जानते हैं इस दिव्य धाम की वह अनसुनी गाथा, जो शिव पुराण और पौराणिक कथाओं के रहस्यों को समेटे हुए है।

भारत मंदिरों का देश है और हमारे देश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जिनका संबंध या तो किसी दूसरे युग से है या फिर उनका इतिहास हजारों साल पुराना है। आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका इतिहास रामायण काल से जुड़ा है।

इसका संबंध दशानन रावण से है। यह मंदिर कर्नाटक में उत्तर कन्नड़ जिले की भटकल तहसील में स्थित है जो तीन ओर से अरब सागर से घिरा हुआ है। समुद्र तट पर स्थित होने की वजह से इस मंदिर के आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत लगता है।

हम बात कर रहे हैं मुरुदेश्वर मंदिर की, जो भगवान शिव को समर्पित है। मुरुदेश्वर भगवान शिव का एक नाम है। इस मंदिर की खासियत है कि इसके परिसर में भगवान शिव की एक विशाल मूर्ति स्थापित है जिसे दुनिया की दूसरी सबसे विशाल और ऊंची शिव प्रतिमा माना जाता है।
शहर को पहले मृदेश्वर के नाम से जाना जाता था। हालांकि, मंदिर के निर्माण के बाद इसका नाम बदलकर मुरुदेश्वर कर दिया गया था।

दशानन रावण से संबंध
पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब दशानन रावण अमरता का वरदान पाने के लिए भगवान शिव की तपस्या कर रहा था, तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसको एक शिवलिंग दिया जिसको आत्मलिंग कहा जाता है। महादेव ने रावण से कहा कि अगर तुम अमर होना चाहते हो, तो इस शिवलिंग को ले जाकर लंका में स्थापित कर देना। ध्यान रहे कि इस शिवलिंग को जिस भी जगह पर रख दोगे, यह वहीं पर स्थापित हो जाएगा।
भगवान शिव के कहे अनुसार रावण शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था। रास्ते में भगवान गणेश ने चालाकी से रावण से इस शिवलिंग को लेकर गोकर्ण में जमीन पर रख दिया जिससे वह शिवलिंग वहीं पर स्थापित हो गया।
इससे क्रोधित होकर दशानन शिवलिंग को उखाडऩे और नष्ट करने की कोशिश करने लगा और शिवलिंग के टूटे हुए टुकड़े फेंक दिए। इस क्रम में जिस वस्त्र से शिवलिंग ढका हुआ था, वह म्रिदेश्वर के कन्दुका पर्वत पर जा गिरा। म्रिदेश्वर को ही अब मुरुदेश्वर के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण में इस कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

विशाल शिव मूर्ति
भगवान शिव की यहां स्थापित विशाल मूर्ति की ऊंचाई करीब 123 फुट है। इसको इस तरह से बनाया गया है कि सूर्य की किरणें इस पर दिनभर पड़ती हैं। मूर्ति चांदी के रंग में कुछ इस तरह रंगी है कि सूर्य की किरणें पड़ते ही यह अद्भुत रूप में प्रतीत होती है।
यह शिव प्रतिमा इतनी विशाल और ऊंची है कि इसे भीतर से देखने के लिए इसमें एक लिफ्ट भी लगी है। इसको बनाने में करीब 5 साल का समय लगा था और करीब 5 करोड़ रुपए की लागत आई थी। इस मंदिर को देखने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।
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Content Writer
Niyati Bhandari