Kalanaur Shiva Temple : पंजाब का रहस्यमयी कलानौर शिव मंदिर, जहां शयन मुद्रा में विराजते हैं देवों के देव महादेव
punjabkesari.in Wednesday, Jun 24, 2026 - 03:14 PM (IST)
Kalanaur Shiva Temple : ऋषि-मुनियों और महापुरुषों की तपोस्थली भारत के कण-कण में अध्यात्म और इतिहास इस कदर रचे-बसे हैं कि इसे ‘तीर्थों की भूमि’ कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पंजाब के गुरदासपुर जिले में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट बसे ऐतिहासिक कस्बे कलानौर का प्राचीन महाकालेश्वर शिव मंदिर, इसी अद्भुत ताने-बाने का एक जीवंत और ज्वलंत उदाहरण है। मंदिर की सबसे बड़ी विलक्षणता यहां का ‘लेटा हुआ शिवलिंग’ यानी शयन मुद्रा में विराजमान होना है। देश-दुनिया के अमूमन सभी शिव मंदिरों में महादेव खड़े रूप में पूजे जाते हैं, वहीं यहां उनका लेटे रूप में विराजमान होना ईश्वर की निराकार और सर्वव्यापी सत्ता का बोध कराता है। भू-गर्भीय रूप से यह एक स्वयंभू शिवलिंग है, जिसे किसी शिल्पकार द्वारा तराशा नहीं गया है।
अनंत लीलाओं के स्वामी भोलेनाथ शिव शम्भू का यह मंदिर महज लोक-कथाओं पर टिकी कोई जगह नहीं है। यह 1556 की मुगल ताजपोशी, 19वीं सदी के सिख साम्राज्य के स्थापत्य और सदियों पुरानी अनूठी भू-गर्भीय संरचना का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। जनश्रुतियों के अनुसार, हर वर्ष महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर इस स्वयंभू शिवङ्क्षलग के आकार में होने वाली सूक्ष्म वृद्धि, विज्ञान और आस्था के बीच के उस रहस्यमयी धागे को और मजबूत करती है, जिसे तर्क से परे केवल श्रद्धा से ही महसूस किया जा सकता है।
इतिहास के अनुसार, 14 फरवरी, 1556 में जब 13 वर्षीय किशोर अकबर की ताजपोशी कलानौर में हो रही थी, तब उनके सैनिकों के घोड़े इस विशेष स्थान से गुजरते ही लंगड़े हो जाते थे। अकबर यह जान कर हैरान रह गया। उसने स्वयं यह देखने के लिए अपना घोड़ा इस स्थान से निकलने का प्रयास किया परन्तु वह भी लंगड़ा हो गया। अचंभित होकर जब अकबर ने यहां खुदाई करवाई तो जमीन के नीचे से एक विशाल काला पत्थर (शिवलिंग) निकला। कहते हैं कि खुदाई और गहरी की गई तथा इस विशाल काले पत्थर को तोड़ने की कोशिश की गई तो वहां से खून की धाराएं निकलने लगीं। यह देखकर अकबर भयभीत होकर नतमस्तक हो गया। उसने तुरंत खुदाई रुकवाई, क्षमा मांगी और इस स्थान की पवित्रता को बनाए रखने के लिए एक चबूतरे और छोटे मंदिर का निर्माण करवाया।
कालचक्र बदला, मुगल सल्तनत इतिहास के गर्त में समा गई और यह स्थान घने जंगलों से घिर कर उपेक्षित हो गया। 19वीं शताब्दी में पंजाब की धरती पर शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख साम्राज्य का उदय हुआ। यह इस मंदिर की साझी विरासत का दूसरा स्वर्णिम अध्याय था। महाराजा के पुत्र युवराज खड़क सिंह को भोलेनाथ ने सपने में दर्शन देकर इस मंदिर के पुनरुद्धार के लिए प्रेरित किया। ईश्वरीय प्रेरणा से प्रेरित होकर युवराज ने इस उपेक्षित और घने जंगलों के बीच छिपे शिवालय का पुनरुद्धार करवा भव्य शिव मंदिर का निर्माण कराया।
एक मुस्लिम शासक की ताजपोशी की भूमि, जमीन से प्रकट हुए महादेव और एक सिख शासक द्वारा उसका भव्य जीर्णोद्धार- यह त्रिकोण यह समझने के लिए पर्याप्त है कि पंजाब की मिट्टी कभी भी संकीर्णताओं में नहीं बंटी, बल्कि यह हमेशा एक साझी संस्कृति (पंजाबियत) की संवाहक रही है। मंदिर हर साल महाशिवरात्रि के त्यौहार पर आस्था के सागर में डूब जाता है जब 3 दिवसीय मेले में पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा से 3 से 5 लाख श्रद्धालु दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। ऐसा ही नजारा यहां श्रावण मास में भी देखने को मिलता है। मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत, आध्यात्मिक और भक्तिमय है। यहां प्रतिदिन सुबह-शाम आरती होती है तथा श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
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