Online Gaming: बच्चों का बदलता व्यवहार दे रहा है खतरे का संकेत? ऑनलाइन गेमिंग हो सकती है बड़ी वजह, रिपोर्ट में हुआ खुलासा
punjabkesari.in Sunday, Feb 08, 2026 - 02:50 PM (IST)
नेशनल डेस्क: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई एक बेहद दर्दनाक घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। साहिबाबाद इलाके की एक हाईराइज सोसाइटी में रहने वाली तीन नाबालिग सगी बहनों ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। शुरुआती जांच में सामने आया है कि तीनों बहनें एक टास्क आधारित ऑनलाइन कोरियन लव गेम से जुड़ी हुई थीं। यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि डिजिटल युग में बच्चों की मानसिक सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
मोबाइल गेमिंग की लत में डूबी थीं तीनों बहनें
जानकारी के मुताबिक, भारत सिटी सोसाइटी में रहने वाली तीन बहनों की उम्र करीब 12, 14 और 16 साल थी। बताया जा रहा है कि वे लंबे समय से मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग में पूरी तरह डूबी हुई थीं। धीरे-धीरे उनका संपर्क बाहरी दुनिया से कम होता चला गया। न वे नियमित रूप से स्कूल जाती थीं और न ही दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलना-जुलना रखती थीं। परिवार वालों का कहना है कि तीनों बहनों ने अपने नाम तक बदलकर कोरियन नाम रख लिए थे और कोरियन संस्कृति को फॉलो करने लगी थीं।
मोबाइल छीना तो बढ़ गया मानसिक दबाव
परिजनों के अनुसार, पिता ने जब बच्चों की बढ़ती मोबाइल गेमिंग की आदत पर आपत्ति जताई और उनके फोन छीन लिए, तो तीनों बहनें गहरे मानसिक तनाव में चली गईं। इसी मानसिक दबाव के बीच यह दुखद कदम उठाया गया। पुलिस को मौके से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें बच्चों ने अपने माता-पिता से माफी मांगते हुए लिखा कि वे यह गेम छोड़ नहीं पा रही थीं। इस नोट ने पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है।
क्या है टास्क बेस्ड कोरियन लव गेम
विशेषज्ञों के अनुसार, कोरियन लव गेम किसी सामान्य गेम की तरह नहीं होता। इसमें सोशल मीडिया के जरिए कोई अनजान व्यक्ति बच्चों या किशोरों से संपर्क करता है और खुद को कोरियन बताकर दोस्ती या प्यार की बातें शुरू करता है। धीरे-धीरे भरोसा जीतने के बाद यूजर को छोटे-छोटे टास्क दिए जाते हैं। शुरुआत में ये टास्क आसान होते हैं, लेकिन समय के साथ इन्हें मानसिक रूप से दबाव बनाने वाला और डर पैदा करने वाला बना दिया जाता है। अगर यूजर टास्क पूरा करने से मना करता है, तो उसे डराया-धमकाया जाता है। इस तरह के गेम कई दिनों तक चलते हैं और यूजर को पूरी तरह अपने जाल में फंसा लेते हैं।
बच्चों के दिमाग पर क्यों पड़ता है गहरा असर
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों और किशोरों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। ऐसे में वे गेम और वर्चुअल दुनिया को ही असली दुनिया समझने लगते हैं। टास्क पूरे करने का दबाव, डर और हार का भय उनके सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर कर देता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जीन एम. ट्वेंग की किताब iGen में भी बताया गया है कि 2011 के बाद से ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया की लत के कारण युवाओं में डिप्रेशन और आत्महत्या के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर बच्चा हर समय मोबाइल या गेम के बारे में ही सोचता रहे, गेम रोकने पर गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाए, परिवार और दोस्तों से दूरी बनाने लगे, नींद और दिनचर्या बिगड़ जाए या पढ़ाई में रुचि खत्म हो जाए, तो ये खतरे के संकेत हो सकते हैं। लगातार उदासी, डर या खालीपन महसूस करना भी गंभीर चेतावनी मानी जाती है। अगर ऐसे कई लक्षण एक साथ लंबे समय तक नजर आएं, तो तुरंत सतर्क होने की जरूरत है।
पेरेंट्स की भूमिका है सबसे अहम
एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों को मोबाइल देना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन उस पर निगरानी बेहद जरूरी है। माता-पिता को बच्चों से खुलकर बातचीत करनी चाहिए और उनके ऑनलाइन व्यवहार को समझने की कोशिश करनी चाहिए। स्क्रीन टाइम पर नजर रखना और स्मार्टफोन में पेरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल करना भी जरूरी है। पेरेंटल कंट्रोल के जरिए बच्चों के गेम, ऐप्स और ऑनलाइन कंटेंट को सीमित किया जा सकता है, ताकि वे खतरनाक गेम्स और मानसिक दबाव पैदा करने वाले चैलेंज से दूर रह सकें।
