अगर ईरान-अमेरिका युद्ध हुआ तो कौन सा मुस्लिम देश किसका देगा साथ? जानें किसके साथ कैसे हैं रिश्ते?
punjabkesari.in Thursday, Jan 15, 2026 - 12:19 AM (IST)
इंटरनेशनल डेस्कः मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) एक बार फिर बड़े संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है। ईरान के अंदर हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। सड़कों पर लाखों लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और अमेरिका ने भी ईरान को लेकर खुली चेतावनी दे दी है। अगर हालात युद्ध में बदलते हैं और ईरान पर हमला होता है, तो सवाल सिर्फ जंग का नहीं होगा। सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि मुस्लिम दुनिया किसके साथ खड़ी होगी? क्या ईरान को मुस्लिम देशों का समर्थन मिलेगा या वह इस लड़ाई में अकेला पड़ जाएगा? ईरान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की मार झेल रहा है। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और कई यूरोपीय देशों इन प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया है।
मौजूदा हालात
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महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर
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ईरानी रियाल की कीमत लगातार गिर रही
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बेरोजगारी बढ़ रही है
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आम लोगों की जिंदगी मुश्किल हो गई है
इसी आर्थिक दबाव की वजह से पिछले दो हफ्तों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।
आंदोलन कैसे सत्ता के खिलाफ पहुंचा?
शुरुआत में प्रदर्शन सिर्फ महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ थे। लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरान की धार्मिक सत्ता व्यवस्था के खिलाफ खुली चुनौती बन गया। बीते करीब 18 दिनों में हिंसा, झड़पों और सरकारी कार्रवाई के दौरान 2000 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें सामने आ चुकी हैं।
अमेरिका की चेतावनी और युद्ध की आशंका
इन हालात के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बयान दिया कि “ईरान को लेकर बहुत मजबूत विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।” इसके बाद चर्चाएं तेज हो गईं कि अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर सैन्य हमला कर सकते हैं। इस आशंका ने पूरे मिडिल ईस्ट को चिंता में डाल दिया है।
क्या मुस्लिम देश एकजुट होंगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि मुस्लिम दुनिया किसी एक फैसले पर नहीं पहुंचेगी। जैसे गाजा युद्ध के समय कई देश खुलकर सामने नहीं आए थे, वैसे ही ईरान-अमेरिका टकराव में भी अधिकतर देश तटस्थ (Neutral) या संतुलित रुख अपनाने की कोशिश करेंगे। हर देश अपने आर्थिक हित, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को देखकर फैसला करेगा।
कतर का रुख क्या रहेगा?
कतर अमेरिका का अहम सैन्य साझेदार है। यहां स्थित अल उदीद एयर बेस अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा माना जाता है, जहां 10,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक, फाइटर जेट और ड्रोन तैनात हैं।
फिर भी क्या कतर युद्ध में उतरेगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक कतर सीधे युद्ध में कूदने से बचेगा। वह अपने सैन्य अड्डे के इस्तेमाल पर सीमाएं लगा सकता है या खुद को न्यूट्रल दिखाने की कोशिश करेगा। कतर की प्राथमिकता क्षेत्रीय युद्ध से बचना और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना होगी।
इराक क्यों दूरी बनाए रखेगा?
इराक की स्थिति बेहद नाजुक है। लंबे समय तक अमेरिकी सेना की मौजूदगी और हालिया अमेरिकी हवाई हमले। इन वजहों से इराक में अमेरिका के खिलाफ नाराजगी है। इसके अलावा इराक के कई राजनीतिक और धार्मिक गुट ईरान के करीबी माने जाते हैं इसलिए अमेरिका को इराक से खुला समर्थन मिलने की उम्मीद कम है। इराक किसी नए संघर्ष से दूर रहना चाहेगा।
तुर्किए की दोहरी मजबूरी
तुर्किए लंबे समय से अमेरिकी और इजरायली दखल की आलोचना करता रहा है। फिलिस्तीन के मुद्दे पर उसने इजरायल का खुलकर विरोध किया है।
लेकिन दिक्कत क्या है?
तुर्किए नाटो का सदस्य है और अमेरिका के साथ उसके सैन्य रिश्ते गहरे हैं। अगर सिर्फ इजरायल हमला करता है, तो तुर्किए ईरान के समर्थन में बयान दे सकता है। लेकिन अगर अमेरिका सीधे उतरा, तो तुर्किए खुद को लड़ाई से दूर रखेगा और मध्यस्थ बनने की कोशिश करेगा।
पाकिस्तान का संभावित रुख
पाकिस्तान पहले से आर्थिक संकट, सुरक्षा चुनौतियों और आंतरिक दबाव से जूझ रहा है। इसलिए वह किसी नए युद्ध में शामिल नहीं होना चाहेगा। हालांकि मुस्लिम एकजुटता की बात करेगा, लेकिन सैन्य समर्थन देने से बचेगा और संयुक्त राष्ट्र में शांति और बातचीत की अपील करेगा।
UAE की मजबूरी और हित
यूएई खासतौर पर दुबई ईरान के लिए बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का कारोबार होता है। इसी वजह से UAE ईरान के खिलाफ खुलकर नहीं जा सकता। दूसरी ओर UAE अमेरिका और सऊदी अरब का करीबी सहयोगी है। इसलिए युद्ध की स्थिति में सीधे लड़ाई से बचेगा और सीमित खुफिया या लॉजिस्टिक सहयोग दे सकता है।
कुवैत की पारंपरिक तटस्थता
कुवैत हमेशा संतुलन की नीति अपनाता आया है।
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ईरान के साथ सामाजिक और धार्मिक संबंध
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अमेरिका और सऊदी अरब से रणनीतिक रिश्ते
कुवैत खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करेगा। उसकी कोशिश मध्यस्थ बनने की और तनाव कम कराने की होगी।
सऊदी अरब की जटिल स्थिति
सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। यमन युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में प्रभाव की लड़ाई इसका उदाहरण है। हालांकि हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में सुधार भी हुआ है। इसलिए युद्ध की स्थिति में सऊदी अरब सीधे सैन्य टकराव से बचेगा और अमेरिका का करीबी होने के बावजूद खुला समर्थन देने से हिचकेगा।
ओमान की शांति भूमिका
ओमान को खाड़ी का सबसे संतुलित देश माना जाता है। उसने पहले भी ईरान और पश्चिम के बीच मध्यस्थता की है। 2015 के परमाणु समझौते में उसकी भूमिका अहम थी। अगर युद्ध होता है तो ओमान न तो किसी को सैन्य अड्डा देगा और न ही किसी पक्ष का साथ देगा, केवल शांति और बातचीत की अपील करेगा।
मिस्र क्यों सतर्क रहेगा?
मिस्र अमेरिका का पुराना सहयोगी है और उसे सैन्य मदद मिलती है। ईरान से उसके रिश्ते न ज्यादा अच्छे हैं, न ज्यादा खराब। मिस्र की प्राथमिकता है गाजा, सिनाई प्रायद्वीप और स्वेज नहर की सुरक्षा। इसलिए वह बड़े युद्ध से दूरी बनाए रखेगा।
जॉर्डन की चिंता
जॉर्डन छोटा लेकिन रणनीतिक देश है। अमेरिका और पश्चिम से मजबूत रिश्ते ईरान से सीमित संपर्क। संघर्ष की स्थिति में जॉर्डन अपने हवाई क्षेत्र और सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान देगा और सीधे युद्ध में शामिल नहीं होगा।
