चीन-ईरान संबंधों में बढ़ती दूरी? BRICS+ बैठक में नहीं दिखी दोनों नेताओं की नजदीकी

punjabkesari.in Saturday, Sep 19, 2026 - 10:37 AM (IST)

नई दिल्ली। नई दिल्ली में पिछले सप्ताह हुए BRICS+ सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच सार्वजनिक तौर पर कोई खास नजदीकी देखने को नहीं मिली। दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक बातचीत तक नजर नहीं आई। यह स्थिति इसलिए चर्चा में रही क्योंकि चीन और ईरान को अक्सर रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखा जाता है। शी जिनपिंग भारत में एक दिन से भी कम समय रहे। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और ग्लोबल साउथ के देशों के बीच चीन की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी पहल के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। हालांकि, ऐसी कोई रिपोर्ट सामने नहीं आई कि उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन से मुलाकात या बातचीत की हो।

चीन के लिए ईरान अहम, लेकिन रिश्ते सीमित

MBN के पहले Great Powers Index के अनुसार, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में ईरान चीन के सबसे करीब रहने वाले देशों में शामिल है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के संबंध आंकड़ों से कहीं ज्यादा जटिल हैं। चीन ईरान का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है, लेकिन बीजिंग ने अपनी व्यापक मध्य पूर्व नीति को पूरी तरह तेहरान के साथ जोड़ने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है। वॉशिंगटन स्थित Stimson Center की China Program की निदेशक यून सन के मुताबिक, चीन इस समय ईरान के साथ बहुत ज्यादा करीबी दिखना नहीं चाहता। उनका कहना है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति समर्थन का संदेश कहीं ज्यादा स्पष्ट तरीके से दिया है।

SCO बैठक में भी दिखी दूरी

पिछले महीने किर्गिस्तान के बिश्केक में हुए Shanghai Cooperation Organization (SCO) सम्मेलन में भी दोनों देशों के बीच दूरी देखने को मिली थी। शी जिनपिंग ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव और किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदर जापारोव के साथ औपचारिक मुलाकातें की थीं। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन की मुलाकात अपेक्षाकृत संक्षिप्त रही और उन्हें कम सार्वजनिक ध्यान मिला।

तेल और कारोबार हैं रिश्तों की बड़ी वजह

चीन और ईरान के बीच संबंध लंबे समय से मुख्य रूप से आर्थिक हितों पर आधारित रहे हैं। चीन को ईरान से सस्ता तेल मिलता है, जबकि ईरान को चीन से जरूरी राजस्व और सामान मिलता है। ईरान अपने किसी भी अन्य देश की तुलना में चीन को ज्यादा निर्यात करता है और चीनी सामान पर भी काफी निर्भर है। हालांकि, दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध बराबरी के नहीं हैं। चीन के कुल वैश्विक व्यापार में ईरान की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से भी कम है। साल 2021 में चीन और ईरान ने 25 साल के व्यापक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें ऊर्जा, बुनियादी ढांचे, व्यापार और सुरक्षा सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल थे। दोनों देशों के अधिकारियों ने इसे रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया था।

ईरान में चीन को लेकर भी चिंता

Jamestown Foundation के मैथ्यू जॉनसन के अनुसार, इस समझौते को लेकर ईरान में भी कुछ लोगों के बीच चिंता रही है। उन्हें डर था कि चीन के बढ़ते प्रभाव से ईरान एक मजबूत देश पर अत्यधिक निर्भर दिखाई दे सकता है। उनके मुताबिक, ईरान के पास अपनी मजबूत सरकारी व्यवस्था और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान है। इसलिए वह चीन के आर्थिक प्रभाव को लेकर दूसरे देशों की तरह आसानी से झुकने की स्थिति में नहीं है। विशेषज्ञ यून सन का कहना है कि ईरान खुद भी चीन के प्रति जरूरत से ज्यादा झुकाव दिखाने से बचता रहा है। यही वजह है कि बीजिंग भी तेहरान के साथ अपने रिश्तों को बहुत ज्यादा आगे बढ़ाने में सावधानी बरतता है।

2021 के समझौते के बाद उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ निवेश

विश्लेषकों के मुताबिक, 2021 के 25 साल के समझौते के बाद चीन की ओर से ईरान में जितने बड़े निवेश की उम्मीद की जा रही थी, वह उस स्तर पर नहीं हुआ। दूसरी ओर, चीन ने पिछले कुछ वर्षों में खाड़ी क्षेत्र के कई देशों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं। इनमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देश भी शामिल हैं, जो अमेरिका के करीबी क्षेत्रीय साझेदार माने जाते हैं। सऊदी अरब चीन के बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है, जबकि चीनी कंपनियों ने UAE में भी बड़े निवेश किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों देशों को ईरान की ओर से मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ा है।

ईरान की सैन्य क्षमता में चीन की मदद पर सवाल

कुछ रिपोर्टों में चीन की ओर से ईरान की क्षमताओं को बढ़ाने में मदद किए जाने की बात कही गई है। हाल ही में Wall Street Journal ने रिपोर्ट किया कि ईरान को जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरें चीनी संस्थाओं से मिली थीं। इसी अमेरिकी सैन्य अड्डे पर ईरान के हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी। हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि तस्वीरें किस चीनी संस्था ने उपलब्ध कराईं। Stimson Center की यून सन ने संभावना जताई कि ये तस्वीरें चीन की BeiDou सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली के जरिए ईरान को पहले से उपलब्ध सेवाओं से भी जुड़ी हो सकती हैं। चीन के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों पर कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करता है और ईरान संघर्ष से जोड़कर चीन को बदनाम करने की कोशिशों का विरोध करता है।

चीन का प्रभाव कितना है?

चीन ने ईरान की सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के प्रयासों का समर्थन किया है। हालांकि, साथ ही चीन ने ईरान से बातचीत और कूटनीतिक समाधान का रास्ता अपनाने की अपील भी की है। विशेषज्ञ यून सन के मुताबिक, किसी देश पर वास्तविक प्रभाव का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि क्या वह दूसरे देश को ऐसा फैसला लेने के लिए तैयार कर सकता है, जिसे वह अपने राष्ट्रीय हित में न मानता हो। उनके अनुसार, चीन का ईरान, रूस या उत्तर कोरिया की नीतियों पर ऐसा प्रभाव दिखाई नहीं देता। यानी दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक संबंध होने के बावजूद, ईरान की नीतियों और फैसलों पर चीन का प्रभाव सीमित नजर आता है।


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News Editor

Rahul Singh

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