तप और दान का असली रहस्य क्या है ? जानें कैसा तप और दान आपको ऊंचा उठाता है

punjabkesari.in Friday, Apr 24, 2026 - 10:41 AM (IST)

True Meaning of Donation : पिछले लेख में हमने तीन प्रकार के भोजन और यज्ञ और उनके शरीर पर होनेवाले परिणामों पर चर्चा की। भगवद गीता तप और दान को भी सत्त्व, रजस और तमस गुणों के अनुरूप, तीन प्रकार में श्रेणीबद्ध करती है। गुरु, देवता, बड़ों और साधू-संतों के प्रति भक्तिभाव, स्वच्छ्ता, स्पष्टवादिता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा; ये सारे शरीर को तपाने के तरीके हैं| मीठा व्यवहार, सत्यवादिता, वेदों, उपनिषदों आदि के अभ्यास और ईश्वर का नाम जपते रहना, ये सारे वाणी के तप हैं| प्रसन्नता, सौम्यता, ईश्वर चिंतन, इंद्रियों पर संयम और भाव की शुद्धता, मन के तप हैं। 

True Meaning of Donation

जब मन, शरीर और वाणी का तिगुना तप पूरी श्रद्धा से बिना किसी फल की अपेक्षा से किया जाता है, तो वह तप सात्विक कहलाता है| जो तप नाम, प्रसिद्धि, लोकप्रियता या किसी भौतिक फल की अपेक्षा से किया जाता है, वह अनिश्चित व अस्थायी फल देता है और उसे राजसिक कहा जाता है| जो तप मूर्खता एवं हठ से किया जाता है, जिसके कारण स्वयं और दूसरों की हाणि होती है, वह तप तामसिक होता है| काला  जादू और निम्न साधनाओं के अभ्यास इस अंतिम श्रेणी में आते हैं और व्यक्ति को निसंदेह नर्क की ओर ले जाते हैं।

विस्मयजनक बात यह है कि आज के समय में सात्त्विक तप करनेवाले लोग अल्पसंख्या में हैं| ऐसे आश्रमों में शुल्क की अपेक्षा नहीं की जाती, साधना का हेतु केवल आत्मिक उत्थान होता है, गुरु साधक के उत्थान के लिए उसे उसकी त्रुटियों का बोध कराते हैं तथा उन्हें दूर करने का मार्ग दिखाते हैं।

True Meaning of Donation

देवी-देवताओं के दर्शन और सूक्ष्म जगत के अनुभव ऐसे गुरुकुलों तक ही सीमित होते हैं। अनेक योगशालाएं भौतिक सुखों की प्राप्ति का दावा कर जन साधारण से द्रव्य व धन ऐंठते हैं। इन योगशालाओं में लोगों को अस्थायी सुखों के अनुभव तो मिल जाते हैं परंतु, उन्हें अपनी जेबें खाली करने के बाद भी परम सत्य के दर्शन नहीं होते, और वे लोग पीड़ादयी जन्म-मृत्यु के चक्र में फंस जाते हैं। 

तप की तरह दान के भी तीन प्रकार होते हैं जो उनके अनुकूल परिणाम देते हैं| जो दान कर्तव्य के रूप में, बिना किसी फल की अपेक्षा के, योग्य समय और योग्य स्थान पर योग्यतानुसार जीव को दिया जाता है, उसे सात्विक दान कहा जाता है| जो दान किसी सहायता, सेवा या इनाम की अपेक्षा से किया जाता है उसे राजसिक दान कहते हैं और जो दान किसी दुष्ट कामना से बिना किसी लिहाज के, किसी भी समय और किसी भी स्थान पर अयोग्य जीवों को दिया जाता है, उसे तामसिक दान कहते हैं।

True Meaning of Donation

दान का स्वरुप ऐसा होना चाहिए कि बाएं हाथ को पता न चले कि दाहिने हाथ ने क्या दिया है| वैरागी वृत्ति से, गुरु वाक्य अनुसार आवारा और वन्य जानवरों की सेवा, गरीब बच्चों की  शिक्षा और भूकों को खाना खिलाना, ये दान के कुछ उदाहरण हैं जिनके कारण आत्मिक उन्नति के पथ पर व्यक्ति तीव्र गति से बढ़ता है। अपने ही दायरे में नाम, प्रसिद्धि, लोकप्रियता, प्रशंसा, ख्याती और सहायता बटोरने की दृष्टि किये गए दान के परिणाम सीमित व नश्वर होते हैं।

True Meaning of Donation

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Content Editor

Sarita Thapa

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