क्या आप भी अपनों को 'गधा' या 'बैल' समझते हैं? तो इस कहानी से सीखें आपसी सम्मान की अहमियत
punjabkesari.in Sunday, Apr 19, 2026 - 04:06 PM (IST)
Inspirational Context : एक सेठ ने दो विद्वानों को भोजन पर आमंत्रित किया। समय पर दोनों विद्वान पधारे, तो सेठ ने उनको आदर से आसन पर बिठाया। उनमें से एक विद्वान जब स्नान करने के लिए गए तो सेठ ने दूसरे विद्वान से कहा, “महाराज, यह आपके साथी तो महान विद्वान मालूम होते हैं। दूसरे विद्वान ने कहा यह और विद्वान?
क्या बात करते हो जी यह तो निरा बैल है बैल। सेठ को बहुत बुरा लगा, किन्तु वह चुप हो गया।
पहले विद्वान जब स्नान करके वापस आए, तो दूसरे विद्वान स्नान करने के लिए गए। सेठ जी ने उनसे भी वही प्रश्न किया, महाराज, आपके साथी तो बड़े विद्वान लगते हैं। पहले विद्वान बोले, “सेठ जी किसने बहका दिया आपको?
यह तो निरा गधा है गधा।” जब भोजन का समय आया, तो सेठ ने चांदी की थाली में ढक कर एक विद्वान के आगे घास रख दी और दूसरे के आगे भूसा रख दिया। दोनों के बैठने पर सेठ जी ने निवेदन किया कि भोजन प्रारंभ कीजिए। विद्वानों ने जब ढक्कन उठाया, तो उस भोजन को देखकर दोनों विद्वान क्रोध में तमतमा उठे। बोले- हमारा अपमान करने का आप में साहस कैसे हुआ?

सेठ जी ने हाथ जोड़कर नम्रता से कहा, “महाराज, मैंने तो आप लोगों के कथन के अनुसार ही आपके सम्मुख भोजन परोसा है। आपने इनको बैल बताया था और इन्होंने आपको गधा बताया था, सो वैसा ही भोजन मुझे मंगवाना पड़ा। इसमें मेरा क्या दोष है।
विद्वान जी, मैं तो आप दोनों को ही विद्वान समझता था, इसलिए आमंत्रित किया था, किन्तु वास्तविकता का ज्ञान तो आप लोगों से ही प्राप्त हुआ है। सेठ की बात सुनकर दोनों विद्वान मन-ही-मन लज्जित हुए और सोचने लगे परस्पर ईर्ष्या का परिणाम अच्छा नहीं होता। ईर्ष्या एक धीमी आग है जो मनुष्य को बुरी तरह जला डालती है।
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