Surkanda Devi Shaktipeeth : पहाड़ों की गोद में बसा चमत्कारी शक्तिपीठ, जानिए सुरकंडा देवी मंदिर का दिव्य रहस्य
punjabkesari.in Friday, Jun 26, 2026 - 07:46 AM (IST)
Surkanda Devi Shaktipeeth : उत्तराखंड के टिहरी जनपद में स्थित सुरकंडा देवी मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। समुद्र तल से लगभग 2750 मीटर की ऊंचाई पर सुरकुट पर्वत शृंखला पर स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है। मसूरी-चंबा मार्ग पर धनोल्टी से लगभग 8 किलोमीटर तथा नरेंद्र नगर से करीब 61 किलोमीटर दूर स्थित यह तीर्थस्थल हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

चंबा-मसूरी मार्ग पर स्थित कद्दुखाल से करीब अढ़ाई किलोमीटर की पैदल चढ़ाई के बाद मंदिर तक पहुंचा जाता है। यह मार्ग घने जंगलों और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों से होकर गुजरता है। मंदिर परिसर से देहरादून, ऋषिकेश, चकराता, प्रतापनगर, चंद्रबदनी सहित हिमालय की अनेक पर्वत शृृंखलाओं के भव्य दृश्य दिखाई देते हैं। स्वच्छ वातावरण, रंग-बिरंगे फूलों की बहार, औषधीय वनस्पतियां और पश्चिमी हिमालय के दुर्लभ पक्षी इस क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा दक्ष की पुत्री सती ने भगवान शिव को पति रूप में स्वीकार किया था, लेकिन राजा दक्ष इस विवाह से प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें शिवजी को आमंत्रित नहीं किया गया। इसके बावजूद सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं, जहां भगवान शिव का अपमान होते देख वह अत्यंत व्यथित हो गईं और यज्ञ कुंड में कूदकर प्राण त्याग दिए।

भगवान शिव को इस घटना का पता चला तो वह शोक और क्रोध से व्याकुल होकर सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। माना जाता है कि जिस स्थान पर माता सती का सिर गिरा, वह स्थान पहले ‘सिरकंडा’ कहलाया, जो कालांतर में ‘सुरकंडा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार देवराज इंद्र ने इसी स्थान पर तप और प्रार्थना करके अपना खोया हुआ स्वर्गीय राज्य पुन: प्राप्त किया था। इस कारण यह स्थल मनोकामना पूर्ति के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध माना जाता है। सुरकंडा देवी मंदिर में स्थापित देवी की प्रतिमा श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से दर्शन और पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा उनके जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं।

अनोखा प्रसाद
मंदिर का एक अनोखा आकर्षण यहां मिलने वाला प्रसाद भी है। सामान्यत: मंदिरों में लड्डू, पेड़ा या माखन-मिश्री का प्रसाद दिया जाता है, लेकिन सुरकंडा देवी मंदिर में भक्तों को रौंसली वृक्ष की पत्तियां प्रसाद स्वरूप प्रदान की जाती हैं। इन पत्तियों को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि जहां ये पत्तियां रखी जाती हैं, वहां सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। रौंसली को देववृक्ष माना जाता है और इसकी लकड़ी का उपयोग धार्मिक कार्यों के अतिरिक्त अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं किया जाता। मंदिर के कपाट वर्षभर खुले रहते हैं और गंगा दशहरा और नवरात्र के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
