Shrikhand Mahadev: श्रीखंड महादेव पर होता है देवताओं का शाही समागम, 33 करोड़ देवी-देवता और इंद्र की परियां यहां उतरती हैं
punjabkesari.in Tuesday, Jul 21, 2026 - 03:14 PM (IST)
Shrikhand Mahadev: हिमाचल प्रदेश की दुर्गम कंदराओं और बर्फीले शिखरों के बीच बसा श्रीखंड महादेव केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि आस्था और पौराणिक रहस्यों का ऐसा संगम है जहां आज भी प्रकृति के कण-कण में देवत्व महसूस होता है। 32 किलोमीटर की रोमांचक और कठिन यात्रा के बीच स्थित नयनसर सरोवर की उत्पत्ति की कहानी माता पार्वती के अटूट धैर्य और उनके अश्रुओं से जुड़ी है। यह वह पावन भूमि है जहां भस्मासुर का अहंकार भस्म हुआ, पांडवों ने अपने वनवास के पदचिह्न छोड़े और जहां आज भी मकर संक्रांति पर देवताओं का शाही स्नान होता है। आइए, श्रीखंड महादेव और नयनसर झील के उन अनसुने पहलुओं को जानें जो इसे दुनिया के सबसे रहस्यमयी स्थानों में से एक बनाते हैं।

श्रीखंड महादेव की कहानी बड़ी ही रोचक है तभी तो हर कोई यहां जाना चाहता है। कहते हैं भस्मासुर राक्षस ने यहां तपस्या की और भगवान शिव से वरदान मांगा था। वरदान यह था कि जिसके सिर पर भी वह अपना हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा। लेकिन अहंकार में भस्मासुर भगवान शिव के ही पीछे पड़ गया। उसी दौरान भोलेनाथ को इन पहाड़ की गुफाओं में छिपना पड़ा।
राक्षस के डर से पार्वती यहां रो पड़ीं। उनके अश्रुओं से यहां नयनसरोवर का निर्माण हुआ। इसकी एक एक धार यहां से 25 किमी नीचे भगवान शिव की गुफा निरमंड के देव ढांक तक गिरती है। इसके बाद भस्मासुर का वध किया गया।
एक कथा के अनुसार जब पांडवों को 13 साल का वनवास हुआ तो उन्होंने कुछ वक्त यहां बिताया। इसके साक्ष्य वहां भीम द्वारा बड़े-बड़े पत्थरों को काटकर रखना बताया जाता है। राक्षस का लाल रक्त जब जमीन पर पड़ा तो उस जगह की जमीन लाल रंग की हो गई। यह आज भी वहां लाल रंग में मौजूद है। भीमडवार पहुंचने के बाद रात के समय यहां कई जड़ी-बूटियां चमक उठती हैं। यहां रंग-बिरंगे फूल आज भी खिलते हैं।
करीब 32 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में बर्फीले और जड़ी-बूटियों से लदे पहाड़ आते हैं। हिमाचल प्रदेश के पर्वत शिखरों मणिमहेश, कैलाश, नीलकंठ और श्रीखंड आदि पवित्र स्थानों में प्राकृतिक रूप से झील या सरोवर बने हुए हैं। इनमें स्नान करके श्रद्धालु अपनी यात्रा को सफल मानते हैं। ऐसी झीलों में नयनसर श्रीखंड महादेव से संबंधित है। किंवदंती के अनुसार श्रीखंड को भगवान शिव का लिंग विग्रह माना जाता है। इनमें से एक नयनसर का अपना ही विशेष महत्व है। श्रीखंड को जाने वाले रास्ते के साथ लगते भीम डवारी के समीप ही नयनसर का पवित्र स्थान आता है।

ऐसे हुआ नयनसर सरोवर निर्माण
कहते हैं कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र में एक भयानक राक्षस निवास करता था। उसने शिव की घोर तपस्या की और भगवान के प्रसन्न होने पर शिव से ऐसा वरदान प्राप्त किया जिसके बल पर वह जिसके सिर पर हाथ फेरता वह जलकर भस्म हो जाता। इस वरदान का दुरुपयोग कर उसने तमाम ऋषि-मुनियों को मार गिराया। राक्षस भस्मासुर नाम से प्रख्यात हुआ। जब उसके पाप का घड़ा भरने लगा तो वह पार्वती पर आसक्त हुआ और उसे प्राप्त करने के लिए शिव को ही मारने दौड़ पड़ा।
जनश्रुति के अनुसार आगे-आगे शिव और पार्वती व पीछे भस्मासुर पर्वत शिखर की ओर भाग रहे थे। यहां पहुंचते ही पार्वती थक कर भूमि पर गिर गई और रोने लगी। पार्वती के नेत्रों से जो आंसू गिरे उसी से नयनसर का निर्माण हुआ ऐसा माना जाता है।

पार्वती ने 84 हजार वर्ष तक की थी तपस्या
यह भी माना जाता है कि जिला कुल्लू के निरमंड के पर्वत शिखरों में श्रीखंड कैलाश मार्ग में डवारी पड़ाव से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर बकासुर वध पार्वती बाग होते हुए नयनसर पहुंचते हैं। इसी क्षेत्र में पार्वती ने 84 हजार वर्ष तक भगवान शिव की तपस्या की। वर्तमान में यह स्थान पार्वती बाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। एक बार अपनी तपस्या को असफल होता देख पार्वती की आंखों में अश्रु धारा बहने लगी और उन अश्रुओं से तालाब बन गया जिसका नाम नयनसर पड़ा। हर साल हजारों की संख्या में मानव सहित देवी-देवता भी यहां शाही स्नान करते हैं। खास बात यह है कि मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर 33 करोड़ देवी-देवता अपने दिव्य रूप में यहां स्नान करने के लिए आते हैं, वहीं देवराज इंद्र की परियां भी यहां स्नान करने आती हैं, ऐसी लोक मान्यता है।

ऐसे हुआ भस्मासुर का वध
माना जाता है कि संकट के समय पार्वती ने भगवान विष्णु का आह्वान किया। भगवान विष्णु ने तुरंत पार्वती का रूप धारण कर भस्मासुर को अपनी ओर आकर्षित किया। पार्वती ने शर्त के मुताबिक भस्मासुर को अपनी ही तरह नृत्य करने को विवश किया। नाचते-नाचते पार्वती रूप में भगवान विष्णु ने अपने सिर पर हाथ फेरा, नकल करते हुए भस्मासुर का हाथ ज्यों ही सिर पर गुजरा उसी क्षण वह भस्म हो गया।

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