Religious Katha : मीठा सागर कैसे बन गया खारा? जानें माता पार्वती के उस भीषण श्राप की पूरी कहानी
punjabkesari.in Saturday, Jan 03, 2026 - 01:16 PM (IST)
Religious Katha : आज हम समुद्र के पास जाते हैं तो उसकी विशालता देखकर दंग रह जाते हैं, लेकिन उसका पानी पी नहीं सकते। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। एक समय था जब समुद्र का जल अमृत के समान मीठा और निर्मल हुआ करता था। लेकिन एक भूल ने इसे हमेशा के लिए बदल दिया। तो आइए जानते हैं माता पार्वती के श्राप से क्यों खारा हुआ समुद्र का मीठा पानी।

जब समुद्र को हुआ अपनी शक्ति पर अभिमान
सतयुग की बात है, समुद्र देव को अपनी विशालता और अपने मीठे जल पर बहुत गर्व था। उन्हें लगता था कि समस्त संसार की प्यास बुझाने की शक्ति केवल उन्हीं के पास है और उनके बिना सृष्टि का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। यह अहंकार धीरे-धीरे उनके विवेक पर हावी होने लगा।

माता पार्वती की तपस्या और समुद्र देव का प्रस्ताव
पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता पार्वती भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं, तब उनकी दिव्यता और आभा को देखकर समुद्र देव उन पर मोहित हो गए। वे माता पार्वती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचे। माता ने अत्यंत शालीनता से उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा कि वे अपना जीवन महादेव को समर्पित कर चुकी हैं। अपनी इच्छा पूरी न होते देख समुद्र देव को क्रोध आ गया। अहंकार वश उन्होंने भगवान शिव का अपमान करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा, एक वैरागी और भस्मधारी शिव के पास तुम्हें देने के लिए क्या है? मैं रत्नों का स्वामी हूं, मेरे पास अनंत संपदा है और मेरा मीठा जल पूरी सृष्टि का आधार है। माता पार्वती अपने आराध्य और होने वाले पति का अपमान सहन न कर सकीं। समुद्र देव के इस व्यवहार और अहंकार को देख उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया।
माता पार्वती ने समुद्र देव को उनकी मर्यादा याद दिलाते हुए कहा: "हे समुद्र! तुम्हें जिस जल की मिठास और अपनी धन-दौलत पर इतना घमंड है कि तुम स्वयं महादेव का अनादर कर रहे हो, मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि आज से तुम्हारा यह समस्त जल खारा हो जाएगा। यह जल अब किसी भी प्यासे की प्यास बुझाने के काम नहीं आएगा।"
माता के श्राप के प्रभाव से उसी क्षण समुद्र का मीठा जल खारा हो गया। समुद्र देव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने क्षमा मांगी, लेकिन श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था। हालांकि, बाद में माता ने दया भाव दिखाते हुए यह कहा कि समुद्र के भीतर कई अनमोल रत्न और औषधियां हमेशा बनी रहेंगी, लेकिन उसका पानी पीने योग्य नहीं रहेगा।

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