Premanand Maharaj: आपके शरीर त्याग के बाद शिष्यों की क्या होगी गति? शिष्य के प्रश्न पर प्रेमानंद महाराज ने दिया भावुक और मार्गदर्शक उत्तर

punjabkesari.in Thursday, Jan 15, 2026 - 09:33 AM (IST)

Premanand Maharaj Satsang News: वृंदावन के प्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज अपने सरल, करुणामय और गहन आध्यात्मिक विचारों के लिए देश-विदेश में जाने जाते हैं। केली कुंज आश्रम, वृंदावन में आयोजित उनके सत्संगों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और शिष्य भाग लेते हैं। हाल ही में हुए एक सत्संग के दौरान शिष्यों के मन में उठा एक अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक प्रश्न चर्चा का विषय बन गया, जिस पर प्रेमानंद महाराज ने गहराई से उत्तर दिया।

शिष्य का प्रश्न: ‘आपके शरीर त्यागने के बाद हमारी क्या गति होगी?’

सत्संग के दौरान एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक पूछा— “महाराज जी, कृपा करके बताइए कि आपके शरीर त्यागने के बाद हमारी क्या गति होगी और हमारे लिए आपकी क्या आज्ञा रहेगी?”

यह प्रश्न सुनकर सत्संग में मौजूद शिष्य भावुक हो गए। प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने अत्यंत शांत और करुणामय स्वर में शिष्यों का मार्गदर्शन किया।

‘संत के देह त्याग के बाद एक रिक्तता आती है’— प्रेमानंद महाराज

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि जब तक महापुरुषों और संतों का शरीर संसार में रहता है, तब तक उनके प्रभाव, ऊर्जा और सानिध्य का अनुभव सबसे अधिक होता है।

उन्होंने कहा—“जब संत शरीर का त्याग करता है, तो उस स्थान पर एक प्रकार की रिक्तता आ जाती है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि मोबाइल, वीडियो या रिकॉर्डेड माध्यम से वह शांति और ऊर्जा प्राप्त नहीं होती, जो प्रत्यक्ष दर्शन और आमने-सामने संवाद से मिलती है।

गुरु की तुलना मां से की
प्रेमानंद महाराज ने गुरु-शिष्य संबंध को समझाते हुए गुरु की तुलना मां से की। उन्होंने कहा कि जैसे बच्चे के लिए मां का सानिध्य अत्यंत आवश्यक होता है, उसी प्रकार शिष्य के लिए गुरु का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन संजीवनी के समान होता है।

गुरु के शरीर त्याग के बाद शिष्यों के लिए क्या है आज्ञा?
प्रेमानंद महाराज ने शिष्यों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि गुरु के शरीर त्यागने के बाद शिष्यों के लिए सबसे बड़ी आज्ञा होती है—
गुरु द्वारा दिया गया नाम
गुरु की वाणी
गुरु के सिद्धांत और साधना पद्धति
उन्होंने कहा कि जो शिष्य गुरु के दिए हुए नाम और मंत्र का निष्ठा से जप करता है, वह कभी अकेला नहीं होता।

सच्ची गुरु सेवा क्या है?
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि सच्ची गुरु सेवा का अर्थ केवल शारीरिक सेवा नहीं, बल्कि गुरु की आज्ञा का पालन और साधना में दृढ़ता है। उन्होंने शिष्यों को प्रेरित करते हुए कहा— “जब तक संत साक्षात हैं, उनके सानिध्य का पूरा लाभ उठाओ। इसके बाद उनकी वाणी और सिद्धांतों को ही जीवन का आधार बना लो।”

उन्होंने इसी मार्ग को सच्ची गुरु सेवा बताया।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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