स्वस्तिक भारत यात्रा का 9वां दिन: मथुरा से कुरुक्षेत्र पहुंचे मोरारी बापू, धर्मक्षेत्र में दिया भजन और स्वस्तिक का संदेश
punjabkesari.in Sunday, Oct 18, 2026 - 03:12 PM (IST)
Morari Bapu Bharat Swastik Yatra Day 9( परविंदर कुमार मिश्रा) : स्वस्तिक भारत यात्रा के नौवें दिन पूज्य मोरारी बापू की यात्रा मथुरा से चलकर कुरुक्षेत्र पहुंची। कुरुक्षेत्र की इस पावन भूमि पर पहुंचकर मोरारी बापू ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और उस धर्मक्षेत्र को नमन किया, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इस दौरान उन्होंने ब्रह्म सरोवर को भी मानसिक रूप से आचमन करके प्रणाम किया। मोरारी बापू ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण तो सदैव रहता है, लेकिन कुरुक्षेत्र केवल कुरुक्षेत्र ही नहीं, बल्कि धर्मक्षेत्र भी है। उन्होंने कहा कि यहां धर्मक्षेत्र को मर्मक्षेत्र बना दिया गया है। मैं तो स्वस्तिक की बात करने निकला हूं, लेकिन यहां भगवान ने पहले से ही स्वस्तिक की रचना कर रखी है। यहां कुंड और अन्य धार्मिक स्थल बने हुए हैं, जिन्हें देखने और नमन करने के लिए मैं आया हूं। इसके साथ ही स्वस्तिक भारत यात्रा के नौवें दिन ज्ञानानंद जी महाराज भी कुरुक्षेत्र पहुंचे। उन्होंने इस यात्रा की सराहना की। यात्रा के दौरान धर्म, भजन, स्वस्तिक और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े विचारों पर चर्चा हुई। मोरारी बापू ने अपने संदेश में भजन को जीवन का आधार बताते हुए संयम, संतों की संगति, धर्म चिंतन और आवश्यकताओं को सीमित रखने पर जोर दिया। कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर उन्होंने स्वस्तिक के माध्यम से धर्म, भक्ति और जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया।
भजन है अमृत, स्वस्तिक का केंद्र बिंदु है भजन
मोरारी बापू ने भजन और स्वस्तिक के संबंध पर अपने विचार रखते हुए कहा कि जब गीता का पारायण होता है, भजन होता है, तो वहां स्वस्तिक का भाव भी होता है। भज गोविंदम जीवन में स्वस्तिक का केंद्र बिंदु है। उन्होंने कहा कि भजन अमृत है, लेकिन जब व्यक्ति भजन से विमुख लोगों की संगति करता है और धर्म चिंतन से दूर हो जाता है, तो उसका स्वस्तिक भी डगमगाने लगता है। उन्होंने कहा कि इसके पीछे कुछ स्वार्थी और बुरे लोगों की भूमिका भी रही है। कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र है और यहां बड़े-बड़े तपस्वी तथा साधु-संत हैं। इस स्थान का विकास होना भी आवश्यक है। तुलसीदास जी ने रामायण के प्रत्येक कांड में अलग-अलग भूमिका बनाई और अंत में परम विश्राम की बात कही। मोरारी बापू ने कहा कि यदि संतों के लिए एक संत नगरी बनाई जाए और भारत के संत एक जगह एकत्र होकर स्वस्तिक की रचना करें, तो बहुत कुछ संभव हो सकता है।
अति बोलने से होती है हानि, भजन में आती है कमी
मोरारी बापू ने जीवन में संयम के महत्व को समझाते हुए कहा कि हमें जरूरत से ज्यादा नहीं बोलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हम मां के गर्भ में थे, तब मौन थे। इसलिए जीवन में वाणी पर संयम रखना जरूरी है। अति बोलने से क्षति होती है और बाद में व्यक्ति को अपनी कही हुई बातों से हुए नुकसान को संभालने में लगना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जरूरत से ज्यादा बोलने से भजन में कमी आती है और शरीर की ऊर्जा भी कम होती है। बिना किसी कारण भीड़ का हिस्सा बनने से भी भजन प्रभावित होता है। हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए। किसी की निंदा सुनने से मन की रुचि और एकाग्रता प्रभावित होती है।
अति भोजन, क्रोध और विलासिता भी भजन में बाधा
मोरारी बापू ने कहा कि जरूरत से ज्यादा भोजन करना, अत्यधिक क्रोध करना और विलासिता में डूबे रहना भी भजन के मार्ग में बाधा बनता है। तुलसीदास जी के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भोजन ग्रहण करने से पहले भगवान को भोग लगाना चाहिए। व्यक्ति को भोजन अवश्य करना चाहिए, लेकिन उसमें भगवान के प्रति समर्पण का भाव भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आवश्यकता से अधिक वस्तुओं की इच्छा भी व्यक्ति को भजन से दूर कर सकती है। जब मनुष्य के भीतर यह भाव आने लगता है कि उसे यह भी चाहिए और वह भी चाहिए, तो उसकी इच्छाएं बढ़ती जाती हैं। जीवन का अंत सामने होने पर भी इच्छाओं का सिलसिला खत्म नहीं होता। मोरारी बापू ने कहा कि संतों के भजन में जो आनंद मिलता है, वह केवल अमीरी और भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं मिल सकता।
श्री हनुमान जी का जीवन है स्वस्तिक का प्रतीक
मोरारी बापू ने श्री हनुमान जी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन स्वस्तिक का प्रतीक है। इसी संदर्भ में उन्होंने चौपाई ‘चारों जुग परताप तुम्हारा’ का स्मरण किया। उन्होंने मुक्ति और पुनर्जन्म के विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि लोग मानते हैं कि मुक्त होने के बाद दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता, लेकिन उनके अनुसार मुक्ति के बाद भी दोबारा जन्म लेना व्यक्ति के अपने वश में होना चाहिए। उन्होंने बताया कि महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भजनीय बताया और स्वयं उनके सारथी बने। भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र आने से पहले द्वारिका में थे। द्वारिका गुजरात में स्थित है और सौराष्ट्र क्षेत्र में गुजराती भाषा बोली जाती है। इसी संदर्भ में मोरारी बापू ने कहा कि ठाकुर जी गुजराती भाषा भी जानते थे।
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