भारत स्वस्तिक यात्रा का पांचवां दिन: तुलजापुर में मोरारी बापू ने मां तुलजा भवानी को किया नमन, स्वस्तिक के आध्यात्मिक और राष्ट्रीय कल्याण से जुड़े अर्थ समझाए

punjabkesari.in Wednesday, Oct 14, 2026 - 03:16 PM (IST)

Bharat Swastik Yatra Day 5 Tuljapur( परविंदर कुमार मिश्रा) : भारत स्वस्तिक यात्रा के पांचवें दिन भारत गौरव ट्रेन सोलापुर स्टेशन पहुंची। तुलजापुर में श्रीराम कथा की शुरुआत मां तुलजा भवानी को प्रणाम करके मंगलाचरण और स्वस्तिवाचन के साथ हुई। पूज्य मोरारी बापू ने इस धरती, छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य और मां तुलजा भवानी की महिमा को नमन किया। उन्होंने कहा कि मां तुलजा भवानी का स्मरण होते ही शिवाजी महाराज की याद आती है। मां भवानी के अनेक नामों में उमा, अंबिका और तुलजा भवानी भी शामिल हैं। बापू ने बताया कि स्वस्तिक केवल एक चिह्न नहीं, बल्कि कल्याण का प्रतीक है। इसकी अवधारणा को भवनों की संरचना, वनस्पतियों, यंत्रों, यज्ञ कुंड और आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़कर समझाया जा सकता है। उन्होंने ओम और स्वस्तिक के आध्यात्मिक स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वस्तिक का मूल भाव है- धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो और विश्व का कल्याण हो। उन्होंने यज्ञ में विधि, मंत्र, दक्षिणा, भोजन और आहुति के महत्व पर भी चर्चा की।

राष्ट्र के कल्याण में साधु मत का महत्व

रामचरितमानस के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि किसी निर्णय में लोकमत के साथ संतों के विचार और मार्गदर्शन को भी महत्व देना चाहिए। उन्होंने भरत और भगवान श्रीराम के प्रसंग तथा छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके गुरु की कथा के माध्यम से अहंकार त्यागने और हर जीव के महत्व को समझाया। बापू ने कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति की राय सुनना भी जरूरी है, लेकिन निर्णय लेते समय विवेक और साधु मत का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी के संदर्भ में भी संतों की महत्ता बताई और कहा कि राष्ट्र के कल्याण के लिए संतों का मार्गदर्शन, परिवार के सदस्यों की राय और जनहित की भावना जरूरी है। शिक्षा को केवल वित्त आधारित नहीं, बल्कि चित्त आधारित होना चाहिए। राजनीति के संदर्भ में भी उन्होंने मनुष्य के विचारों और उसके पीछे की नीति को महत्वपूर्ण बताया।

संत चरित्रों और रामभक्ति की महिमा

कथा में मोरारी बापू ने मोरारी दास से जुड़ा एक प्रसंग सुनाया, जिसमें एक सूखे वृक्ष को हरा करने के संकल्प और राम नाम की महिमा का वर्णन किया गया। उन्होंने तुलसीदास जी से जुड़ी नीम के वृक्ष की कथा का भी उल्लेख किया। इन प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने समझाया कि रामभक्ति मनुष्य के जीवन में नई चेतना ला सकती है। भगवान श्रीराम और केवट के प्रसंग को सुनाते हुए बापू ने भगवान की विनम्रता, भक्त के प्रति प्रेम और चरणामृत की महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने केवट, भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा से जुड़े प्रसंगों का भी उल्लेख किया, जिन्हें संत परंपरा में भक्ति और सेवा के भाव से समझा जाता है।

दांपत्य जीवन में रामकथा के आदर्श अपनाने का संदेश

मोरारी बापू ने कहा कि दांपत्य जीवन को सहज और सुखमय बनाने के लिए रामकथा के आदर्शों को व्यवहार में उतारना चाहिए। उन्होंने भगवान श्रीराम और भगवान शिव के संबंध तथा परशुराम-श्रीराम के धनुष प्रसंग का उल्लेख करते हुए श्रद्धा, विनम्रता और परस्पर सम्मान का संदेश दिया। कथा के माध्यम से बापू ने स्वस्तिक को व्यक्तिगत, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय कल्याण से जोड़ते हुए कहा कि जीवन में संतों के मार्गदर्शन, रामभक्ति, विवेक और लोककल्याण की भावना को अपनाना चाहिए।

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Content Editor

Sarita Thapa

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