भारत स्वस्तिक यात्रा पहुंची हम्पी, किष्किंधा की पावन भूमि पर गूंजी मोरारी बापू की रामकथा

punjabkesari.in Wednesday, Oct 14, 2026 - 11:28 AM (IST)

हम्पी, कर्नाटक : पूज्य मोरारी बापू की भारत स्वस्तिक यात्रा कर्नाटक के हम्पी पहुंची। इसके साथ ही भारत की आध्यात्मिक यात्रा रामायण और प्राचीन किष्किंधा क्षेत्र से गहराई से जुड़ी इस पावन भूमि तक पहुंची। हम्पी में रामकथा का आयोजन कन्याकुमारी से केदारनाथ तक की यात्रा के प्रथम चरण का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित हम्पी विजयनगर साम्राज्य के भव्य अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। इसके साथ ही सनातन परंपरा में भी इसका विशेष स्थान है। इस क्षेत्र को परंपरागत रूप से किष्किंधा से जोड़ा जाता है, जो भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव और बालि से संबंधित वानर राज्य था।

भक्तों के लिए हम्पी और इसके आसपास का पावन क्षेत्र रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों की स्मृति जगाता है। अंजनाद्रि पहाड़ी को परंपरागत रूप से हनुमान जी की जन्मस्थली माना जाता है, जबकि पंपा सरोवर माता शबरी की भक्ति और भगवान श्रीराम से उनके मिलन से जुड़ा है। ऋष्यमूक पर्वत सुग्रीव की शरणस्थली तथा हनुमान जी के माध्यम से श्रीराम और सुग्रीव के मिलन से संबंधित है। वहीं, माल्यवंत पर्वत को उस स्थान के रूप में पहचाना जाता है, जहां माता सीता की खोज की प्रतीक्षा करते हुए भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ने वर्षा ऋतु बिताई थी। ये सभी स्थल इस क्षेत्र को रामायण की किष्किंधा कथा से जोड़ते हैं।

ऐसे गहन आध्यात्मिक और ऐतिहासिक परिवेश में मोरारी बापू की रामकथा का आयोजन हो रहा है। इसके माध्यम से रामचरितमानस की शाश्वत कथा उस भूमि पर जन-जन तक पहुंच रही है, जहां भगवान श्रीराम की कथाएं पवित्र परंपराओं, मंदिरों और तीर्थस्थलों के माध्यम से पीढ़ियों से संरक्षित हैं। आज कर्नाटक के हम्पी में मोरारी बापू ने मंगल दर्शन के बारह शुभ स्वरूपों की चर्चा की, जिन्हें उन्होंने ‘दर्शन द्वादशी’ नाम दिया। उन्होंने कहा, “पहला है मानस दर्शन, क्योंकि मानस स्वयं एक स्वस्तिक है। इसके बाद गौ दर्शन, गौ के समान सहज, सौम्य और देने वाले स्वभाव वाले संत का दर्शन तथा अपने देश का दर्शन आता है। जब हम भारत की दृष्टि से संसार को देखते हैं, तो हमारा दृष्टिकोण और अधिक गहरा अर्थ प्राप्त करता है। इसके बाद यह यात्रा भीतर की ओर मुड़ती है और निज दर्शन अर्थात स्वयं के दर्शन से होते हुए देव दर्शन, ब्रह्म दर्शन, प्रकृति दर्शन, परस्पर शुभ दर्शन, तत्त्व दर्शन और अंततः समाधि दर्शन तक पहुंचती है।

एक पवित्र सेवक वही है, जो छह विकारों से मुक्त हो जाता है। जब ये सभी अशुद्धियां दूर हो जाती हैं, तब जो शेष रह जाता है, वह है पवित्रता। मंगल की ओर जाने वाली यात्रा वास्तव में आंतरिक शुद्धि की यात्रा है। जो निरंतर सत्यधाम में स्थित रहता है, वह सर्वज्ञता अर्थात सच्ची समझ और ज्ञान को प्राप्त करता है। कामना है कि ये बारह मंगलमय दर्शन हमारे भीतर पवित्रता, सामंजस्य और सर्वकल्याण की भावना जागृत करें। यही स्वस्तिक का गहन मंगल है और हमारी भारत स्वस्तिक यात्रा का मूल भाव भी।”

हम्पी भारत के सभ्यतागत इतिहास के एक अन्य महत्वपूर्ण अध्याय का भी साक्षी है। यह विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी और मंदिर संस्कृति, साहित्य, दर्शन, कला तथा व्यापार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुई। भगवान शिव को समर्पित विरुपाक्ष मंदिर, जिसका संबंध देवी पंपा से भी माना जाता है, आज भी पूजा-अर्चना का एक सक्रिय केंद्र है। यह हम्पी की पवित्र पहचान की निरंतरता को दर्शाता है। विजयनगर काल के भव्य मंदिरों और स्थापत्य संरचनाओं को वर्ष 1986 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। इस प्रकार, हम्पी में भारत स्वस्तिक यात्रा की उपस्थिति भारत की विरासत के दो महत्वपूर्ण आयामों को एक साथ जोड़ती है। रामायण से जुड़ी जीवंत आध्यात्मिक परंपराएं और उस सभ्यता की ऐतिहासिक धरोहर, जिसने हम्पी को दक्षिण भारत के महान सांस्कृतिक केंद्रों में से एक बनाया।

भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन पूज्य मोरारी बापू के मार्गदर्शन में संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा किया जा रहा है। मिराज ग्रुप के चेयरमैन एवं संतकृपा सनातन संस्थान के मैनेजिंग ट्रस्टी मदन पालीवाल ने कहा, “हम्पी हमें याद दिलाता है कि हमारी सभ्यतागत विरासत केवल स्मारकों या इतिहास की पुस्तकों तक सीमित नहीं है। यहां की पवित्र भूमि आज भी भगवान श्रीराम, हनुमान जी और किष्किंधा से जुड़ी कथाओं, परंपराओं और आस्था के माध्यम से जीवंत है। भारत स्वस्तिक यात्रा को यहां लाना और इस पावन परिवेश में बापू की रामकथा का आयोजन करना हमारी जीवंत विरासत से जुड़ने तथा उसके मूल्यों को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सार्थक माध्यम है।”

हम्पी का यह पड़ाव देश के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों को जोड़ने के भारत स्वस्तिक यात्रा के व्यापक प्रयास का एक और महत्वपूर्ण चरण है। स्वस्तिक और उससे जुड़े ‘स्वस्ति’ अर्थात कल्याण, मंगल एवं शुभता के भाव से प्रेरित यह यात्रा भारत की आध्यात्मिक परंपराओं को जोड़ने और विभिन्न क्षेत्रों तथा जीवन के विविध क्षेत्रों से जुड़े लोगों को एक साथ लाने का प्रयास कर रही है। यात्रा का प्रथम चरण 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से प्रारंभ हुआ और अब दक्षिण, मध्य तथा उत्तर भारत के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों से होते हुए केदारनाथ की ओर आगे बढ़ेगा। यात्रा का दूसरा चरण 14 नवंबर को द्वारका से प्रारंभ होकर 22 नवंबर को जगन्नाथ पुरी में संपन्न होगा।

भारत स्वस्तिक यात्रा के दौरान लगभग 9,000 किलोमीटर की यात्रा में करीब 900 श्रद्धालु पूज्य मोरारी बापू के साथ दो विशेष ट्रेनों- कैलाश भारत गौरव ट्रेन और चित्रकूट भारत गौरव ट्रेन में यात्रा करेंगे। इन ट्रेनों में क्रमशः 22 और 16 कोच हैं। भारत स्वस्तिक यात्रा में जीवन के विविध क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल होंगे, जिनमें आध्यात्मिक नेता, आचार्य, विद्वान, उद्योगपति, समाजसेवी, सामाजिक नेता और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि शामिल हैं। मोरारी बापू की रामकथा सदैव सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों पर आधारित रही है। यह यात्रा इन मूल्यों को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने और लोगों को आपस में जोड़ने का एक और अवसर है। यात्रा के दौरान रामकथा और उससे जुड़े सभी कार्यक्रम सभी के लिए खुले रहेंगे। समावेशिता और सेवा की अपनी परंपरा के अनुरूप, प्रत्येक पड़ाव पर भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जहां प्रतिदिन निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा।

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Content Editor

Sarita Thapa

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