कुंडली के किस ग्रह दोष से छुटकारा पाने के लिए की जाती है भात पूजा ?

2021-06-23T12:13:55.907

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
सनातन धर्म के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र में कई तरह की पूजा-पाठ का वर्णन किया गया है, ये तमाम तरह की पूजा पाठ विभिन्न प्रकार के कार्यों की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। तो वहीं इनमें अनेकों ही ऐसे उपाय आदि बताए गए जिन्हें करने से व्यक्ति के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। आज हम ज्योतिष शास्त्र में बताई गई एक ऐसी ही पूजा के बारे में बताने जारहे हैं, जिसे करने से कुंडली के ग्रह अच्छा व शुभ प्रभाव देने लगते हैं। दरअसल हम बात कर रहे हैं कुंडली में मौजूद मंगल ग्रह की, जिसकी स्थिति खराब होने पर जातक की कुंडली में मंगल दोष उत्पन्न हो जाता है। कहा जाता है कि जिसकी कुंडली में मंगल दोष पैदा हो जाता है उस जातक के विवाह में देरी होती है। 

ज्योतिष विद्वान बताते हैं कि जब जातक की कुंडली में लग्न चौथे, सातवें, आठवें या 12वें स्थान में मंगल बैठे हो तब कुंडली में मांगलिक योग बनता है, और उस व्यक्ति को मांगलिक कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में मंगल कुंडली दोष होता है, उन्हें विवाह के उपरांत भात पूजा करने की सलाह दी जाती है। मगर ये भात पूजा है क्या, कैसे की जाती हैै, इस सब के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं, तो आइए विस्तारपूर्वक जानते हैं भात पूजा कैसे की जाती है। बता दें भात का अर्थ चावलों से है। धार्मिक मान्यताओं हैं कि शिवलिंग रूपी मंगल देव की पूजा चावलों से की जाती है। मान्यता है ऐसे करने से जातक की कुंडली में मौजूद  मांगलिक दोष का नाश होता है। ज्योतिषी मानते हैं कि जिस किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल दोष होता है उन्हें अपने जीवन में एक बार भात पूजा अवश्य करनी चाहिए। 

बता दें, प्रत्येक पूजा की तरह इस पूजा में भी सर्वप्रथम देव गणेश जी को पूजा जाता तथा उसके बाद देवी पार्वती का पूजन होता है। फिर विधि पूर्वक नवग्रह पूजन को संपन्न किया जाता है। इसके उपरांत कलश पूजन एवं शिवलिंग रूपी भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। इस दौरान वैदिक मंत्रों का करके देवी-देवताओं के साथ नवग्रहों का आवाहन किया जाता है। आखिर में शिव शंकर को भात अर्पित की जाती है तथा विधिवत रूप से भात पूजन, अभिषेक और मंगल जाप के बाद फिर आरती गाई जाती है।

यहां जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा-
भात पूजा से जुड़ी एक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में अंधकासुर नामक एक दैत्य ने शिव जी की कठोर तपस्या की, और उन्हें प्रसन्न कर उनसे वरदान प्राप्त कर लिया कि उसके रक्त से सैंकड़ों दैत्य जन्म ले सकेंगे। जिसके बाद अंधकासुर ने उज्जैन नगरी में तबाही मचा दी थी। उसने ऋषि और मुनियों सहित अन्य लोगों का वध करना प्रारंभ कर दिया। इस सबसे से घबराकर देवी-देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की, जिसके बाद शिव जी ने अंधकासुर से युद्ध किया। कथाओं के अनुसार युद्ध के दौरान शिव जी का पसीना बहने लगा। भगवान शिव के पसीने की बूंदों की गर्मी से उज्जैन की धरती फट कर दो भागों में विभक्त हो गई और मंगल ग्रह का जन्म हुआ।

एक तरफ़ जहां महादेव ने दैत्यों का संहार किया तो दूसरी ओर दैत्यों रक्त की बूंदों को नव उत्पन्न मंगल ग्रह ने अपने अंदर समा लिया। ऐसा कहा जाता है यही कारण है कि मंगल की धरती लाल रंग की होती है। जब मंगल उग्र अंगारक स्वभाव के हो गए तब सभी देवताओं सहित सभी ऋषि मुनियों सर्वप्रथम मंगल की उग्रता की शांति के लिए दही और भात का लेपन किया क्योंकि दही और भात दोनों ही पदार्थ ठंडे होते हैं जिसके कारण मंगल देव की उग्रता शांत हो गई।  


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

Jyoti

Recommended News