Makar Sankranti: बड़े दिनों का हुआ आरंभ, भारतवासी अजब-गजब तरीके से मनाएंगे ये त्यौहार

punjabkesari.in Wednesday, Jan 15, 2020 - 07:58 AM (IST)

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मकर संक्रांति के दिन सूर्य की कक्षा में हुए बदलाव को अंधकार से प्रकाश की तरफ हुआ बदलाव माना जाता है। मकर संक्रांति से ही दिन के समय में बढ़ौतरी होती है। इसलिए भारतीय ज्योतिष की गणनानुसार मकर संक्रांति ही बड़ा दिन है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रस्थान करता है और कांपते, ठिठुरते शीत पर धूप की विजय यात्रा आरंभ होती है। इस भांति प्रकाश में बढ़ौतरी होती है। लोगों को कामकाज के लिए अधिक समय मिलने लगता है। इसी पर एक कहावत प्रसिद्ध है- बहुरा के दिन लहुरा, खिचड़ी के दिन जेठ यानी भादों कृष्ण पक्ष चौथ (बहुरा चौथ) से दिन छोटा होने लगता है तथा मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को पूरे भारतवर्ष में त्यौहार के रूप में मनाते हैं।

PunjabKesari Makar Sankranti 2020

यह त्यौहार पूरे भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे ‘खिचड़ी पर्व’ कहते हैं। मकर संक्रांति के मौके पर गंगा-यमुना या पवित्र सरोवरों, नदियों में स्नान कर तिल-गुड़ के लड्डू एवं खिचड़ी देने और खाने की रीति रही है। लड़की वाले अपनी कन्या के ससुराल में मकर संक्रांति पर मिठाई, रेवड़ी, गजक तथा वस्त्रादि भेजते हैं। उत्तर भारत में नववधू को पहली संक्रांति पर मायके से वस्त्र, मीठा तथा बर्तन आदि भेजने का रिवाज है। गुजरात में संक्रांति के दिन तिल गुड़ खाने की परम्परा है साथ ही पतंगबाजी भी यहां खूब प्रचलित है। पतंग उड़ाना भी शुभ मानते हैं। गुजरात में प्रति वर्ष इस समय पतंग उत्सव का भी आयोजन किया जाता है।

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असम में ‘भोगाली बिहू’ तो तमिल लोग इसे ‘पोंगल’ के रूप में मनाते हैं। सुख सम्पत्ति तथा संतान की कामना हेतु मनाया जाने वाला तमिलनाडु का त्यौहार ‘पोंगल’ मकर संक्रांति का ही प्रतीक है। लोगों के सांस्कृतिक जीवन के साथ पारंपरिक रूप से जुड़ा पोंगल ही एक ऐसा त्यौहार है जिसे मद्रास या चेन्नई (तमिलनाडु) के सभी वर्ग के लोग धूमधाम से मनाते हैं। उड़ीसा और बंगाल में इसे ‘बिशु’ कहते हैं तो उत्तराखंड में ‘घुघुतिया’ या ‘पुसूडिया’ के नाम से जाना जाता है।

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सूर्य अर्चना के लिए मकर संक्रांति के दिन की और सारे माघ महीने की खास उपयोगिता है। त्यौहार धार्मिक आस्था के जीवंत प्रतीक होते हैं। इस पर्व पर दो बातें अत्यधिक उपयोगी होती हैं। प्रथम गंगा स्नान और द्वितीय दान।  

कहते हैं ‘राजा हर्षवद्र्धन’ प्रत्येक वर्ष इसी दिन अपनी महारानी के साथ गंगा तट पर जाते तथा अपना सब दान कर देते थे। इस दिन इलाहाबाद में ‘संगम’ पश्चिम बंगाल में ‘गंगा सागर’ तथा हरिद्वार में ‘हर की पौड़ी’ पर स्नान करने का विशेष महत्व है।

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शिव रहस्य शास्त्र में मकर संक्रांति पर तिल और सरसों के दान का उल्लेख विस्तार से मिलता है। अंगारों पर तिल चटकाना, तिल तथा तिल से बनी वस्तुएं दान करना इस अवसर पर शुभ माना जाता है। कई जगह इस पर्व को ‘तिल संक्रांति’ भी कहा जाता है। दाल और आटे के साथ काले तिल के लड्डुओं पर दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दिया जाता है। इसके साथ ही दाल और चावल की खिचड़ी में सब्जी पैसा तथा तिल के लड्डू डालकर भिक्षुओं को भी दान देने का रिवाज है।

मकर संक्रांति के दिन तुला दान और शैय्या दान दोनों को ही अक्षय फल देने वाला बताया गया है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को ‘मन्वंतर तिथि’ कहते हैं। उस दिन किया गया दान भी अक्षय होता है।  


 


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Niyati Bhandari

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