Maa Kali Mandir: पंजाब के दो सिद्धपीठ- जहां पुत्रप्राप्ति की मनोकामना होती है पूर्ण

punjabkesari.in Sunday, Nov 09, 2025 - 01:18 PM (IST)

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Maa Kali Mandir: पंजाब के सीमावर्ती गुरदासपुर जिले के बटाला नगर के बीचों बीच स्थित प्रसिद्ध प्रचीन और ऐतिहासिक काली माता मंदिर सांस्कृतिक धरोहर का एक चमकता हुआ प्रतीक है। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से बनी एक धार्मिक संरचना या केवल एक उपासना स्थल नहीं, बल्कि श्रद्धा, परम्परा, इतिहास, आस्था और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक केंद्र भी है।

मां काली की शक्ति, भक्ति और संरक्षण का भाव इस मंदिर में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। प्राचीन लोक कथाओं और परंपराओं के अनुसार, इस मंदिर में साधु-संत और तांत्रिक साधक साधना करने आया करते थे। मां काली की कृपा से उन्होंने अद्वितीय सिद्धियां प्राप्त कीं और नगर को भी संकटों से मुक्ति दिलाई। यही कारण है कि समय बीतने के साथ मंदिर की ख्याति और श्रद्धा और अधिक प्रबल होती चली गई।

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महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और यह मंदिर नगर का प्रमुख धार्मिक स्थल बना रहा। माना जाता है कि विभिन्न आक्रमणों और अशांति के काल में भी मंदिर में मां काली की आराधना कभी बंद नहीं हुई। स्थानीय लोग मानते हैं कि नगर की रक्षा और सुख-समृद्धि में मां का आशीर्वाद ही प्रमुख रहा है। मंदिर का गर्भगृह मां काली की दिव्य प्रतिमा से सुशोभित है। प्रतिमा को लाल चुनरी, फूलों की मालाओं और शृंगार से सजाया जाता है।

मां के स्वरूप में जहां एक ओर संहार की भयानकता है, वहीं दूसरी ओर भक्तों के लिए संरक्षण और कृपा की कोमलता। यह द्वैत स्वरूप ही मां काली की विशेषता है, जो भक्तों को सिखाता है कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए शक्ति आवश्यक है। साथ ही भक्तों के लिए करुणा और संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।

यहां यह धारणा भी प्रचलित है कि मां काली भक्तों को केवल भय से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और शक्ति से भी भर देती हैं। यही कारण है कि मंदिर के दर्शन मात्र से ही लोग मनोबल और शांति का अनुभव करते हैं। इस मंदिर में भगवती काली मां का स्वरूप पंजाब सहित भारत के सभी शहरों में पाए जाने वाले श्री काली माता मंदिरों में विराजमान स्वरूप से बिल्कुल अलग है। अधिकतर मंदिरों में काली मां के स्वरूपों की जीभ बाहर निकली हुई दिखाई पड़ती है, जो उनकी क्रोधावस्था को दर्शाती है लेकिन यहां भगवती काली मां शांत स्वभाव में हाथ में हनुमान जी को बैठाये नजर आती हैं, जो मैया की करुणामयी वासाल्सय अवस्था को दर्शाता है।

महामाई की इसी करूणामयी स्वरूप के दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में अमीर, गरीब शहरवासी सुबह शाम मंदिर आते हैं और एक ही पंक्ति में खड़े होकर मां के चरणों में शीश नवाते हैं। विशेष पर्वों- नवरात्रि, चैत्र और शरद अष्टमी और दीपावली पर मंदिर में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जहां भजन-कीर्तन, जगराता और धार्मिक प्रवचन होते रहते हैं। आज के समय में जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब भी यह मंदिर लोगों को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़े रखता है। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का भी केंद्र है। यहां पूजा-अर्चना के साथ-साथ भक्तों को यह संदेश मिलता है कि शक्ति और संरक्षण का स्रोत अंतत: मां काली ही हैं।

काली माता मंदिर हमें यह स्मरण कराता है कि चाहे समय कितना ही क्यों न बदल जाए, आस्था का दीप हमेशा जलता रहेगा। और यह दीप ही हमारे समाज को आध्यात्मिक ऊर्जा, नैतिक प्रेरणा और सांस्कृतिक आधार प्रदान करता रहेगा। मंदिर में सेवा कर रहे नौंवी पीढ़ी के महंत अमित ने बताया कि 500 वर्ष पहले उनके बजुर्गों को यह काली मां कि पिंडी कुएं में चमत्कारी आवाज में प्राप्त हुई थी। इसके पश्वात उनको मंदिर में स्थापित किया गया व उस कुएं के ऊपर भगवान शिव का मंदिर शिवलिंग रूप में स्थापित है। उन्होंने कहा कि महाराजा रणजीत सिंह ने भी इस मंदिर मे माथा टेक मां के आशीर्वाद से जम्मू कश्मीर राज्य पर हमला करके विजय प्राप्त की थी।

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महंत अमित पराशर ने बताया कि पंजाब में केवल दो धार्मिक स्थल, अमृतसर स्थित श्री दुर्गयाना तीर्थ और बटाला का प्राचीन सिद्ध पीठ काली द्वारा मंदिर है, जहां पर पर लोग अपनी पुत्र प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होने पर अपने बच्चों को लंगूर बनाकर ढोल के साथ माथा टेकने मंदिर में आते हैं।                
 


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Content Editor

Prachi Sharma

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