Deva Snana Purnima 2026 : रथयात्रा से पहले क्यों होता है भगवान जगन्नाथ का महास्नान? जानिए देव स्नान पूर्णिमा का रहस्य

punjabkesari.in Monday, Jun 29, 2026 - 04:11 PM (IST)

Deva Snana Purnima 2026 : उड़ीसा में स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में हर साल रथ यात्रा शुरू होने से पहले भगवान जन्ननाथ और उनके दोनों भाई -बहन बालभद्र और सुभद्रा को 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान करवाया जाता है। इस अनोखी और अद्भुत परंपरा के लिए भी जन्ननाथ मंदिर को जाना जाता है। हर साल आषाढ़ मास में होने वाली भव्य रथयात्रा से ठीक पहले, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को एक बेहद महत्वपूर्ण उत्सव मनाया जाता है, जिसे देव स्नान पूर्णिमा या स्नान यात्रा कहते हैं। इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों भाई बहनों को मंदिर से बाहर लेकर आया जाता है और पूरे विधि-विधान के साथ उनका महास्नान किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रथयात्रा से पहले यह महास्नान क्यों कराया जाता है और इसके पीछे क्या रहस्य छुपा है। तो आइए जानते हैं इस मान्यता के बारे में-

क्यों होता है यह महास्नान?
स्कंद पुराण के अनुसार, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन ही राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी के इस पावन मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की लकड़ी की मूर्तियों को पहली बार स्थापित करवाया था। इसलिए, इस दिन को महाप्रभु जगन्नाथ का 'प्राकट्य दिवस' यानी जन्मदिन माना जाता है। हिंदू परंपरा में जन्मदिन पर विशेष अभिषेक और स्नान कराने की परंपरा है, इसी वजह से इस दिन भगवान का शाही महास्नान होता है। व्यावहारिक और मानवीय भाव के अनुसार, ज्येष्ठ का महीना साल का सबसे गर्म महीना माना जाता है। भगवान जगन्नाथ को उनके भक्त 'मानवीय रूप' में पूजते हैं। वे भी इंसानों की तरह ही सुख-दुख और ऋतु परिवर्तन का अनुभव करते हैं। इसलिए, ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी से भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए इस भव्य स्नान का आयोजन किया जाता है।

महास्नान के बाद भगवान का बीमार होना और 15 दिनों का रहस्य
देव स्नान पूर्णिमा के रहस्य का सबसे दिलचस्प हिस्सा इसके बाद शुरू होता है। कड़े पहरे और शीतल औषधीय जल से स्नान करने के बाद, इंसानों की तरह ही महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को तेज बुखार आ जाता है। बीमार होने के कारण भगवान को तुरंत एक गुप्त विश्राम कक्ष में ले जाया जाता है, जिसे 'अनासर घर' कहते हैं। आज रात से ही मंदिर के कपाट आम जनता के लिए बंद हो जाते हैं और अगले 15 दिनों तक भगवान पूरी तरह एकांतवास में रहते हैं। इस अनासर काल' के दौरान भगवान को कोई 56 भोग या भारी भोजन नहीं दिया जाता। राजवैद्य की देखरेख में उन्हें केवल विशेष काढ़ा, जड़ी-बूटियां और औषधीय तेल चढ़ाया जाता है। वे केवल फल का रस ग्रहण करते हैं। ठीक 15 दिनों के बाद, जब भगवान का बुखार पूरी तरह उतर जाता है, तो वे आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने 'नव यौवन रूप' में भक्तों को दर्शन देते हैं और फिर अपनी प्रसिद्ध रथयात्रा पर निकलते हैं।

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Content Editor

Sarita Thapa

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