Dahi Handi Utsav: कान्हा की माखन चोरी से मानव पिरामिड तक, जानें क्यों मटकियां फोड़कर आज भी इतिहास रचते हैं गोविंदा!
punjabkesari.in Thursday, Sep 03, 2026 - 01:40 PM (IST)
Dahi Handi festival: भाद्रपद मास की अष्टमी को कान्हा के जन्म के बाद, अगले ही दिन देश भर में उमंग और उत्साह का एक अनोखा सैलाब उमड़ पड़ता है। जन्माष्टमी का त्योहार जहां श्री कृष्ण के अवतरण की खुशियां मनाने का पर्व है, वहीं दही हांडी का उत्सव उनके बचपन की नटखट बाल लीलाओं की जीवंत झांकी दिखाता है। गोपियों के घरों से सखाओं के साथ मिलकर चुपचाप मक्खन साफ कर देने वाले 'माखन चोर' की याद में आज भी देश के कोने-कोने में दही और माखन से भरी मटकियां लटकाई जाती हैं। पहले केवल गुजरात और महाराष्ट्र तक सीमित रहने वाला यह रोमांचक खेल, आज गोवा सहित पूरे भारत में एकता और सामाजिक जुड़ाव का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है, जहां गोपालों की टोलियां मानव श्रृंखला बनाकर आसमान छूती हांडी को तोड़ने की चुनौती स्वीकार करती हैं।
दही हांडी का उत्सव नंद के लाला की बाल लीलाओं का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार कान्हा दूध, दही और मक्खन खाने के लिए अपने सखाओं के साथ मिलकर आस-पास के घरों में से माखन चुरा कर खाते थे। इस वजह से उन्हें माखन चोर कहा जाता है। नटखट कान्हा से अपने माखन को बचाने के लिए गोपियों ने माखन को एक मिट्टी के पात्र में भरकर ऊपर लटकाना शुरू कर दिया लेकिन वो तो ठहरे माखन चोर, भला उनकी आंखों से माखन कैसे बच जाए। अपने ग्वाल-बालों के साथ मानव श्रृंखला बना कर लल्ला माखन चुरा ही लिया करते थे और इसमें सबसे ऊपर श्री कृष्ण रहते। इस बाल लीला को दही हांडी के रूप में मनाया जाता है। आज भी अगर कोई बालक खाने-पीने वाली चीज चुपचाप खाता है तो उसे उसकी मां प्यार से माखन चोर कहती है।

दही हांडी मनाने की विधि
हांडी का अर्थ है मिट्टी से बना एक गोल पात्र। इस उत्सव के लिए हांडी में दही और माखन भर दिया जाता है और इसे ऊंचे स्थान पर लटका देते हैं। इसके बाद लड़के-लड़कियों का समूह गोपाल बनकर इस खेल में हिस्सा लेते हैं। कई जगह इस खेल को प्रतियोगिता के तौर पर भी आयोजित किया जाता है और जीतने वाले को इनाम के साथ सम्मानित करते हैं।
जन्माष्टमी से अगले दिन दही हांडी जैसा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिसे विशेष रूप से गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात में धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की लीलाओं को समर्पित है। जिसमें लोग एक बड़े बर्तन में दही और दूध भरते हैं और इसे ऊंचाई पर लटकाते हैं। लोग इसे तोड़ने के लिए एक मानव पिरामिड बनाते हैं, जो भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं का प्रतीक होता है। दही हांडी पर्व एक अवसर है, जब परिवार और समाज के लोग मिलकर खुशी का अनुभव करते हैं और कृष्ण की लीलाओं को श्रद्धा के साथ मनाते हैं। भगवान कृष्ण ने अपने बचपन में दही और मक्खन की मटकियां तोड़ी थीं, जिन्हें उनकी माखन चोरी की लीला के रूप में याद किया जाता है। दही हांडी पर्व इसी याद में मनाया जाता है।
देश भर में दही हांडी का उत्सव ठीक जन्माष्टमी से एक दिन बाद मनाया जाता है। इस बार 24 अगस्त की जन्माष्टमी है तो दही हांडी का उत्सव 25 अगस्त को मनाए जाने की तैयारी है। कहा जाता है जन्माष्टमी का त्यौहार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की खुशियां मनाने का पर्व है तो वहीं दही हांडी कृष्ण की बाल लीलाओं की झांकी दिखाने वाला उत्सव है। बताया जाता है कि पहले समय में दही हांडी को मुख्य रूप से केवल महाराष्ट्र और गुजरात में मनाया जाता था, लेकिन अब इसे पूरे देशभर में धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

कैसे शुरू हुई दही हांडी की परंपरा
शास्त्रों के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद जिसे हम आप भाषा में भादो का महीना भी बोल देते हैं की अष्टमी तिथि को अर्द्धरात्रि में हुआ था। इन्हीं के जन्म की खुशियां मनाने के तौर पर इनके भक्त जिनमें बच्चों से लेकर युवा सभी गोविंदा बनकर जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का आयोजन करते हैं। देश भर में जगह-जगह चौराहों पर दही और मक्खन से भरी मटकियां लटकाई जाती हैं और गोविंदाओं द्वारा मानव पिरामिड बनाकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर इसे तोड़ा जाता है।
