दही हांडी 2026: 5 सितंबर को मचेगी 'गोविंदा आला रे' की धूम, जानें कैसे कान्हा की बाल-लीला आज बन गई महाप्रतियोगिता!

punjabkesari.in Thursday, Sep 03, 2026 - 12:10 PM (IST)

Dahi Handi 2026 Date & Significance: देशभर में इस समय श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं। 4 सितंबर 2026 को आधी रात को कान्हा के जन्म का उत्सव मनाने के ठीक अगले दिन, यानी 5 सितंबर 2026 को देश के कोने-कोने में, विशेषकर महाराष्ट्र में, दही हांडी का पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाएगा। धार्मिक आस्था, अदम्य साहस और बेमिसाल टीमवर्क का प्रतीक माना जाने वाला यह उत्सव आज सिर्फ एक पूजा-विधि नहीं, बल्कि सामूहिक उत्साह का एक बहुत बड़ा सार्वजनिक आयोजन बन चुका है। आइए जानते हैं कि भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही यह बाल-क्रीड़ा आज कैसे करोड़ों के इनाम वाली एक बड़ी साहसिक प्रतियोगिता में बदल गई और इसका सही महत्व क्या है।

Dahi Handi

श्री कृष्ण जन्म के बाद मनाया जाने वाला दही हांडी का उत्सव कान्हा जी के भक्तों के लिए बेहद खास होता है। जन्माष्टमी के अगले दिन इस उत्सव को मनाया जाता है यानी की कृष्ण पक्ष के नवमी तिथि के दिन। इसे गोपाल कला के नाम से भी जाना जाता है। जैसा की आप सब को तो पता ही है की यशोदा के लाल को दूध से बनी चीजें बहुत प्रिय हैं। उन्हें खुश करने के लिए मक्खन, दूध और दही का भोग लगाया जाता है। ग्रंथों में वर्णित कथाओं के अनुसार, बाल लीला के दौरान श्री कृष्ण गोपियों की हांडियों से मक्खन और दही चुरा कर खाया करते थे और इस लीला को आज के समय में दही हांडी के रूप में मनाते हैं। वैसे तो मुख्य तौर पर यह पर्व महाराष्ट्र और गुजरात का है लेकिन पूरे भारत में इस पर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।

जन्माष्टमी के अवसर पर दही हांडी उत्सव हर आयु वर्ग बड़े उत्साह के साथ मनाता है। इस दौरान, ऊंचाई पर बांधी गई हांडी को तोड़ने के लिए गोविंदा मानव पिरामिड बनाते हैं। प्रतियोगिता का हिस्सा बनने के लिए टीमें कई दिनों तक अभ्यास करती हैं। दही हांडी उत्सव के दौरान होने वाली प्रतियोगिताओं में सबसे पहले हांडी तोड़ने वाले गोविंदा को इनाम दिया जाता है। हांडी में दही, दूध, फल, और ड्राई फ्रूट भरे होते हैं, जो टूटने के बाद प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं।

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माखन चोरी और मानव पिरामिड की अनूठी कहानी
दही हांडी का सीधा संबंध नटखट कान्हा की बाल-लीलाओं से है। गोकुल में जब बाल गोपाल की माखन चोरी की आदत से गोपियां परेशान हो गईं, तो वे दही और माखन की मटकियों को बच्चों की पहुंच से दूर रखने के लिए घरों की छतों या ऊंचे स्थानों पर टांग दिया करती थीं। लेकिन नटखट कान्हा भी कहां मानने वाले थे। वे अपने ग्वाल-बाल सखाओं के साथ मिलकर एक मानव पिरामिड (Human Pyramid) तैयार करते और ऊंचाई पर टंगे माखन को चतुराई से उतारकर सब मिलकर खाते थे। आज सड़कों पर गोविंदाओं द्वारा बनाए जाने वाले बहुमंजिला पिरामिड इसी ऐतिहासिक और मनमोहक बाल-लीला के जीवंत प्रतीक हैं।

महाराष्ट्र में कैसे शुरू हुई यह भव्य परंपरा?
दही हांडी का सबसे आकर्षक और भव्य स्वरूप महाराष्ट्र के मुंबई, ठाणे और पुणे जैसे शहरों में देखने को मिलता है। मुंबई महानगरपालिका के पर्यटन दस्तावेजों के अनुसार, इस सार्वजनिक उत्सव के बीज दक्षिण मुंबई के गिरगांव में 18वीं शताब्दी में ही बो दिए गए थे। शुरुआती दौर में अमीर घरों या वाड़ियों के मुख्य द्वारों पर मिट्टी की मटकियों में दही या छाछ भरकर लटकाया जाता था। लोग ढोल-ताशे और लेझिम की थाप पर पारंपरिक जुलूस निकालते हुए आते थे और मानव पिरामिड बनाकर हांडी फोड़ते थे।

पारंपरिक दही हांडी का आधुनिक स्वरूप
वक्त बदला और गलियों की वह छोटी सी मटकी आज विशालकाय मंचों, गोविंदा मंडलों के कठिन अभ्यासों और लाखों रुपये के नकद पुरस्कारों वाली एक बड़ी सार्वजनिक प्रतियोगिता में तब्दील हो चुकी है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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