Chanakya Niti : क्या गलत रास्ते से मिलती है सफलता ? चाणक्य का ये विचार करेगा हैरान
punjabkesari.in Saturday, Mar 28, 2026 - 02:45 PM (IST)
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Chanakya Niti : आचार्य चाणक्य, जिन्हें 'भारतीय राजनीति और कूटनीति का पितामह' माना जाता है, उनकी नीतियां आज हजारों साल बाद भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी मौर्य काल में थीं। अक्सर लोग सफलता के शॉर्टकट ढूंढते हैं और अनैतिक रास्तों पर चलने से भी नहीं हिचकिचाते। लेकिन क्या गलत रास्ते से मिली सफलता टिकती है ? चाणक्य नीति के इस विश्लेषण में जानेंगे कि आचार्य ने अधर्म से प्राप्त सफलता के बारे में क्या चेतावनियां दी हैं।
अधर्म से अर्जित धन की आयु: "दश वर्षाणि तिष्ठन्ति..."
आचार्य चाणक्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है जो गलत रास्ते से मिले धन और सफलता की पोल खोलता है:
"अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता। अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥"
(इसका एक व्यापक संदर्भ यह भी है कि अन्याय से कमाया गया धन केवल 10 वर्षों तक ही टिकता है।)
चाणक्य के अनुसार, जो व्यक्ति छल-कपट, चोरी या किसी को पीड़ा देकर सफलता या संपत्ति हासिल करता है, वह देखने में तो बहुत प्रभावशाली लग सकता है लेकिन ग्यारहवें वर्ष में वह सफलता जड़ समेत नष्ट हो जाती है। गलत रास्ते से मिली सफलता 'रेत के महल' जैसी होती है, जो पहली ही मुश्किल की लहर में ढह जाती है।
सफलता की परिभाषा
चाणक्य के अनुसार, सफलता का अर्थ केवल ऊंचे पद पर बैठना या तिजोरी भरना नहीं है। उनके लिए वास्तविक सफल व्यक्ति वह है जिसकी कीर्ति अक्षुण्ण रहे।
बिना नींव की इमारत: गलत रास्ता आपको शिखर पर तो पहुंचा सकता है लेकिन वहं टिकने के लिए जिस चरित्र और कौशल की आवश्यकता होती है, वह अनैतिक व्यक्ति के पास नहीं होता।
भय का साया: चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति गलत मार्ग चुनता है, वह जीवन भर शत्रु और दंड के भय में जीता है। जिस सफलता में मानसिक शांति न हो, उसे चाणक्य 'पतन' मानते हैं।
'शाम-दाम-दंड-भेद और नैतिकता का संतुलन
अक्सर लोग चाणक्य को कठोर कूटनीतिज्ञ मानकर यह तर्क देते हैं कि उन्होंने तो 'शाम-दाम-दंड-भेद' की बात की है। लेकिन यहां एक सूक्ष्म अंतर है जिसे समझना अनिवार्य है। चाणक्य ने साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग धर्म की स्थापना और राष्ट्र की रक्षा के लिए करने को कहा था, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ या लालच की पूर्ति के लिए। यदि शत्रु अधर्मी है, तो उसे हराने के लिए चाणक्य कूटनीति का समर्थन करते हैं। लेकिन एक सामान्य मनुष्य के लिए अपने करियर या जीवन में दूसरों का हक मारना चाणक्य की दृष्टि में आत्मघाती है।
