श्रृंगेरी की व्यास पीठ से मोरारी बापू का संदेश- अहंकार से नहीं, चित्त और विवेक से सुनें राम कथा

punjabkesari.in Monday, Oct 12, 2026 - 05:42 PM (IST)

Morari Bapu Sringeri Ram Katha (परविंदर कुमार मिश्रा) : स्वस्तिक भारत यात्रा के अंतर्गत श्रृंगेरी में श्रीराम कथा के तीसरे दिन मोरारी बापू ने मां शारदा के दर्शन किए और व्यास पीठ से मां जगदम्बा, इस पवित्र भूमि तथा सभी संतों को प्रणाम किया। संस्कृत विद्यालय में पहुंचकर उन्होंने सभी का धन्यवाद किया और जय सियाराम कहकर अभिवादन किया। उन्होंने बताया कि आदिगुरु शंकराचार्य जी इसी भूमि से केदारनाथ गए थे। कथा के दौरान बापू ने कहा कि राम कथा को मन और बुद्धि दोनों से सुनना चाहिए। अंहकार और द्वेष को दूर रखकर विवेक के साथ कथा को समझना जरूरी हा। उन्होंने कहा कि उनकी बातों को भी बिना विचार किए स्वीकार न करें, बुद्धि  लगाकर समझें। राम कथा बुद्धिमान लोगों को विश्राम प्रदान करती है। उन्होंने श्रोताओं को समझाया कि वह जो भी बोलते हैं, गुरु की कृपा से बोलते हैं, लेकिन उनकी बातों को भी बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं करना चाहिए। हर बात को अपनी बुद्धि और विवेक से समझना जरूरी है। 

मोरारी बापू ने साधु के जीवन और उसके विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साधु के मन में चिंता हो सकती है, लेकिन जो निरंतर चिंता में डूबा रहता है, वह सच्चा साधु नहीं है। सच्चा साधु वह है जो पूरे संसार के कल्याण का चिंतन करता है और जगत के हित के लिए काम करता है। उन्होंने भगवान श्रीराम और सुग्रीव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान राम ने सुग्रीव को भरोसा दिलाया था कि वे उसके संकटों को दूर करेंगे। इसी तरह मनुष्य को भी भगवान पर विश्वास रखना चाहिए। बापू ने कहा कि जगद्गुरुओं और संतों का सान्निध्य मिलना सौभाग्य की बात है। उनके सामने चुप रहकर उनकी सीख को समझने का अवसर गंवाना घाटे का सौदा है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा बजरंग बली की कृपा से सुगम हो जाएगी, लेकिन श्रद्धालुओं को अपनी गलतियों से इसे कठिन नहीं बनाना चाहिए। जीवन में सत्य का महत्व बताते हुए बापू ने कहा कि सत्य को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यदि किसी परिस्थिति में सत्य छूट भी जाए, तो भगवान का स्मरण कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने गजेंद्र के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि जब कोई भक्त सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, तो भगवान उसकी रक्षा के लिए आते हैं। बापू ने द्वारिकाधीश की ध्वजा के दर्शन और भगवान के निरंतर स्मरण के महत्व को भी बताया। उनके अनुसार, परम साधु वही है जो निरंतर भगवान का स्मरण करता रहता है।

दान करते समय भी विवेक का साथ न छोड़ें

मोरारी बापू ने दान की महिमा समझाते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति को दान दिया जाए, तो उसे वापस मांगने का भाव नहीं रखना चाहिए। यदि सामने वाला व्यक्ति अपनी इच्छा से कुछ लौटाता है, तो वह अलग बात है। दान का उद्देश्य निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दान करते समय विवेक का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। चित्त और मन के विषय में बात करते हुए बापू ने कहा कि चित्त का विरोध नहीं करना चाहिए और न ही उसका अत्यधिक निरोध करना चाहिए। उन्होंने रामायण की चौपाइयों के माध्यम से अपने विचार समझाए। साथ ही कहा कि हर व्यक्ति का आहार, निद्रा और वाणी सम्यक होनी चाहिए। उन्होंने स्वयं को भी एक सम्यक श्रोता बताते हुए कथा को सही भाव से सुनने की प्रेरणा दी।

स्वस्तिक मंगल और कल्याण का प्रतीक

स्वस्तिक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मोरारी बापू ने कहा कि स्वस्तिक मंगल, शुभता और कल्याण का प्रतीक है। इसे देखते ही मन में शुभ होने का भाव जागता है। उन्होंने बताया कि महर्षि वाल्मीकि रामायण में शेषनाग के मस्तक पर स्वस्तिक का उल्लेख मिलता है। रामचरितमानस का उदाहरण देते हुए बापू ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपनी रचना में मंगल के भाव को महत्व दिया है। उन्होंने प्रसिद्ध चौपाई का उल्लेख किया।  बापू ने कहा कि हनुमान जी महाराज मंगल करने वाले हैं। उन्होंने इंद्र और इंद्रजीत के प्रसंग के माध्यम से हनुमान जी की शक्ति, संयम और इंद्रियों पर नियंत्रण का महत्व समझाया। उनके अनुसार, हनुमान जी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं और उनका जीवन साहस, सेवा, समर्पण तथा अनुशासन की सीख देता है। उन्होंने हनुमान जी द्वारा सूर्य को ग्रहण करने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उनकी महिमा का वर्णन किया। साथ ही गरुड़, रुक्मिणी जी और सुदर्शन जी के गर्व से जुड़े प्रसंगों का भी जिक्र किया। तुलसीदास जी की पंक्ति जय जय जय हनुमान गोसाईं के माध्यम से उन्होंने हनुमान जी की महिमा का गुणगान किया।
समुद्रिक शास्त्र में वर्णित मंगलकारी शारीरिक चिह्नों का उल्लेख करते हुए बापू ने भगवान श्रीराम के पेट पर तीन रेखाओं, किशोरी जी के चरणों पर मंगल चिह्न और शंख के समान आकार वाले कंठ का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि धार्मिक परंपराओं में ऐसे चिह्नों को शुभता से जोड़कर देखा जाता है।

मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां काली के स्वरूप का महत्व

श्रृंगेरी की पावन भूमि पर मां शारदा और मां सरस्वती की महिमा का वर्णन करते हुए मोरारी बापू ने गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सरस्वती नदी को अदृश्य माना जाता है, उसी प्रकार मनुष्य को अपनी भक्ति और साधना का दिखावा करने के बजाय उसे गुप्त रखना चाहिए। बापू ने कहा कि व्यक्ति अक्सर अपनी पूजा, जप और माला की संख्या का उल्लेख करता है, लेकिन सच्ची साधना में दिखावे की आवश्यकता नहीं होती। जिस प्रकार सरस्वती अदृश्य हैं, उसी प्रकार अपनी भक्ति को भी आडंबर से दूर रखना चाहिए। मां शारदा को वाणी और ज्ञान की देवी बताते हुए बापू ने मां लक्ष्मी तथा मां काली के स्वरूप का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मां लक्ष्मी प्रेम और ऐश्वर्य की प्रतीक हैं, जबकि मां सरस्वती वाणी और ज्ञान प्रदान करने वाली देवी हैं। मां काली के स्वरूप को उन्होंने करुणा और कल्याण से जोड़कर समझाया। बापू ने कहा कि मां काली का रूप भले ही कठोर दिखाई देता हो, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए कल्याणकारी और करुणामयी हैं। केवल तर्क के आधार पर हर आध्यात्मिक भाव को समझना संभव नहीं होता, इसके लिए श्रद्धा, अनुभव और भक्ति का भाव भी जरूरी है।

भगवान शिव की महिमा का उल्लेख करते हुए उन्होंने शिव के स्वरूप से जुड़े श्लोक का संदर्भ दिया

"करालं महाकाल कालं कृपालं"

उन्होंने भगवान शिव और मां काली के कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करते हुए भक्तों को समझाया कि ईश्वर के विभिन्न रूपों में करुणा, शक्ति और कल्याण का भाव निहित है। इस प्रकार श्रृंगेरी में स्वस्तिक भारत यात्रा के अंतर्गत आयोजित श्रीराम कथा के तीसरे दिन मोरारी बापू ने सत्य, विवेक, दान, संतुलित जीवन, स्वस्तिक के मंगलकारी अर्थ, हनुमान जी की महिमा और मां सरस्वती, मां लक्ष्मी तथा मां काली के स्वरूप पर विस्तार से अपने विचार रखे। कथा का मुख्य संदेश यही रहा कि मनुष्य को अहंकार से दूर रहकर विवेक के साथ जीवन जीना चाहिए, सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए और निरंतर भगवान का स्मरण करते हुए संसार के कल्याण का भाव रखना चाहिए।

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Content Editor

Sarita Thapa

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