‘सरकार किसान आंदोलन को सीमा में रखे, व्यापारियों के अधिकार सुरक्षित करे’

10/22/2021 11:37:11 AM

किसी भी जनतंत्र में मत-भिन्नता हमेशा होती है और समाज के लोग किसी निर्णय से असहमत हैं तो अपनी बात रखने या अपना रोष व्यक्त करने का उनका पूरा अधिकार है। इस संदर्भ में किसानों को कृषि बिलों के विरुद्ध अपना रोष व्यक्त करने का अधिकार न केवल सार्थक है बल्कि समाज में हर नजर से स्वीकार्य है। परंतु एक बड़ा सवाल खड़ा होता है, जब किसान अपने आंदोलन की आड़ में किसी दूसरे के व्यवसाय में या किसी दूसरे की रोजी-रोटी पर लात मारते हैं। किसानों को अपना रोष व्यक्त करने का अधिकार निश्चित है, परंतु किसी दूसरे के व्यावसायिक अधिकार का हनन करने का अधिकार न केवल निंदनीय है, अपितु कानून का एक बड़ा उल्लंघन भी है। अपनी बात करते हुए क्या किसानों को यह अधिकार है कि वह दूसरे किसी के रोजगार या आजीविका पर लात मारें?

 

आज पंजाब में कम से कम 10,000 से 12,000 युवक इसलिए बेरोजगार हो गए हैं क्योंकि किसानों ने पंजाब में लगभग 250 व्यावसायिक/ व्यापारिक केंद्रों को जबरदस्ती बंद करवा रखा है। क्या यह सवाल नहीं उठता कि किसानों ने किस अधिकार से इन व्यापारिक केंद्रों को बंद कर रखा है? इन व्यापारिक केंद्रों का किसान आंदोलन से जब कोई वास्ता ही नहीं तो किसानों ने इनका कानूनी अधिकार क्यों दबा रखा है? क्या इनको अपनी आजीविका कमाने का अधिकार नहीं है? क्या किसान फैसला करेंगे कि कौन समाज में चलेगा या नहीं? अगर हम स्वाभाविक तौर पर भी सोचें तो हम जानते हैं कि कृषि और व्यापार साथ-साथ ही चलते हैं।

 

किसान कृषि करने के बाद अपनी उपज व्यापारी को दे देता है और व्यापारी उसे एक व्यवस्था के साथ उपभोक्ता तक ले जाता है। ऐसी व्यवस्था में उन कृषि बिलों से अगर किसान नाराज हैं, जो कि केंद्र सरकार ने लागू किए हैं तो क्या उनका हक बनता है कि कुछ व्यापारी कार्पोरेट्स संस्थानों को चलने से बंद किया जाए? क्या कानून व्यवस्था को ध्यान रखने वाली पुलिस व न्यायिक प्रणाली को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए? पंजाब के अंदर एक बहुत गंभीर स्थिति बनती जा रही है, जहां किसानों के अनियंत्रित आंदोलन पर कोई व्यवस्था काबू नहीं कर पा रही है। ऐसे में क्या हम अराजकता की तरफ बढ़ नहीं रहे हैं? यदि ये प्रश्न उठ रहे हैं तो इसका समाधान यह है कि न्यायिक प्रणाली व पुलिस दोनों को व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व निभाना चाहिए, ताकि समाज आंदोलन के बावजूद अपनी प्रगतिशील दिशा को विकृत न होने दे।


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