भारत के बजट सत्र में चीन का ‘करंसी स्ट्राइक’: युआन से डॉलर को चुनौती का ऐलान, भारत के लिए परीक्षा की घड़ी
punjabkesari.in Sunday, Feb 01, 2026 - 05:55 PM (IST)
International Desk: भारत में बजट पेश होने के साथ ही चीन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा संदेश दे दिया है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने युआन को “मजबूत वैश्विक मुद्रा” बनाने की वकालत करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय रिज़र्व करेंसी के रूप में स्थापित करने का आह्वान किया है। विशेषज्ञ इसे अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को सीधी चुनौती मान रहे हैं और इसका असर भारत पर भी पड़ना तय है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रमुख वैचारिक पत्रिका ‘क्यूशी’ में प्रकाशित लेख में शी जिनपिंग ने कहा कि चीन को ऐसी मजबूत मुद्रा चाहिए, जिसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और विदेशी मुद्रा बाजारों में व्यापक रूप से हो सके।
भारत के लिए क्यों अहम है यह बयान?
भारत इस समय BRICS समूह का प्रमुख सदस्य है और इसी साल BRICS शिखर सम्मेलन की मेज़बानी भी करने जा रहा है। ऐसे में चीन द्वारा युआन को आगे बढ़ाने की यह रणनीति भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा बन सकती है। भारत अब तक डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से सीधे टकराव से बचता रहा है, लेकिन BRICS के भीतर साझा मुद्रा और वैकल्पिक भुगतान प्रणाली पर चर्चा में उसकी भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।
व्यापार और ऊर्जा पर असर
भारत दुनिया का बड़ा ऊर्जा आयातक है और रूस से तेल खरीद में पहले ही डॉलर के बजाय वैकल्पिक भुगतान तरीकों का प्रयोग कर चुका है।अगर BRICS या युआन आधारित भुगतान को बढ़ावा मिलता है, तो भारत को सस्ते व्यापार विकल्प मिल सकते हैं। वहीं, अमेरिका के साथ रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों पर दबाव भी बढ़ सकता है, जैसा कि रूसी तेल को लेकर पहले देखा गया है।
BRICS मुद्रा बनाम डॉलर
चीन और रूस लंबे समय से BRICS साझा मुद्रा और BRICS Pay को आगे बढ़ा रहे हैं। भारत के लिए यह सवाल अहम है क्या वह इस पहल को नेतृत्व देगा? या फिर डॉलर आधारित व्यवस्था और बहुध्रुवीय विकल्पों के बीच संतुलन साधेगा?अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने पर BRICS देशों पर भारी टैरिफ लगाए जा सकते हैं। यह चेतावनी सीधे तौर पर भारत की आर्थिक रणनीति से जुड़ती है।
युआन बनाम रुपया
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युआन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होता है, तो एशिया में मुद्रा प्रतिस्पर्धा तेज होगी। भारत के लिए यह अवसर भी है और जोखिम भी। भारत एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी निभा रहा है, दूसरी तरफ BRICS और ग्लोबल साउथ का प्रमुख चेहरा है। चीन का यह कदम भारत को मजबूर करता है कि वह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र और संतुलित भूमिका स्पष्ट करे।
डॉलर पर निर्भरता घटाने की रणनीति
चीन, जो अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पिछले कुछ वर्षों से डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है।वर्ष 2025 में चीन ने अपने 6.2 ट्रिलियन डॉलर के विदेशी व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा युआन में निपटाया।रूस के साथ तेल और गैस व्यापार में युआन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, चीन ने अब तक करीब 50 देशों के साथ करेंसी स्वैप समझौते किए हैं, जिससे स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा मिल सके।
युआन अभी भी ‘अंडरवैल्यूड’?
हालांकि पिछले एक साल में युआन डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ है, लेकिन गोल्डमैन सैक्स सहित अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंकों का मानना है कि युआन अभी भी अपनी वास्तविक कीमत से करीब 25 प्रतिशत कम मूल्य पर कारोबार कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी केंद्रीय बैंक मजबूत युआन चाहता है, लेकिन तेज़ उछाल से बचने में सतर्क है।
BRICS और भारत का रोल
- चीन और रूस, BRICS समूह के भीतर साझा मुद्रा और BRICS Pay जैसे भुगतान तंत्र को आगे बढ़ा रहे हैं।
- इस साल BRICS शिखर सम्मेलन की मेज़बानी भारत करेगा, जहां यह मुद्दा प्रमुख एजेंडे में रहने की संभावना है।
- वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि डॉलर को चुनौती देने पर BRICS देशों पर भारी शुल्क लगाए जा सकते हैं।
पश्चिमी मॉडल से अलग रास्ता
शी जिनपिंग ने साफ कहा कि चीन की वित्तीय व्यवस्था पश्चिमी मॉडल से अलग होगी और उसकी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित की जाएगी। उन्होंने मजबूत अर्थव्यवस्था, सशक्त केंद्रीय बैंक, वित्तीय संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों को “वित्तीय महाशक्ति” बनने की शर्त बताया।
