वैज्ञानिकों ने पहली बार पौधों को ''सांस'' लेते हुए LIVE VIDEO में किया कैद, देखें कुदरत का अद्धभुत का नज़ारा

punjabkesari.in Monday, Mar 09, 2026 - 09:11 AM (IST)

Plants Breathe: यह वाकई विज्ञान की एक जादुई छलांग है! कल्पना कीजिए कि हम एक पौधे को बिल्कुल वैसे ही सांस लेते देख पा रहे हैं जैसे किसी इंसान का फेफड़ा काम करता है। यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस अर्बाना-शैंपेन (UIUC) के वैज्ञानिकों ने इस 'अदृश्य' प्रक्रिया को दुनिया के सामने लाइव लाकर खेती और पर्यावरण की समझ को हमेशा के लिए बदल दिया है।
 
पेड़ों की धड़कन: जब कैमरे में कैद हुई पौधों की 'सांस'
अब तक वैज्ञानिकों के पास दो रास्ते थे—या तो वे सूक्ष्मदर्शी से पौधों की बनावट देख सकते थे या सेंसर से यह नाप सकते थे कि पौधा कितनी गैस छोड़ रहा है। लेकिन दोनों काम एक साथ करना नामुमकिन था। प्रोफेसर एंड्रयू डी. बी. लीकी और उनकी टीम ने इस दीवार को तोड़ दिया है। उन्होंने एक ऐसा सिस्टम बनाया है जो न केवल जीवित पत्ती की 3D इमेजिंग करता है, बल्कि उसी पल यह भी बताता है कि वह पत्ता कितनी कार्बन डाइऑक्साइड अंदर ले रहा है और कितना पानी बाहर छोड़ रहा है।

क्या है स्टोमेटा और इसकी भूमिका?

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पौधों की पत्तियों पर मौजूद सूक्ष्म छिद्रों को स्टोमेटा कहा जाता है। ये छिद्र तब खुलते हैं जब उनके पास मौजूद 'गार्ड कोशिकाएं' पानी से भर जाती हैं। इनका खुलना जीवन के लिए जरूरी है क्योंकि इसी रास्ते से पौधा कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, लेकिन इसी दौरान पौधे का कीमती पानी वाष्प बनकर उड़ भी जाता है। यह खोज इसलिए अहम है क्योंकि अब हम लाइव देख सकते हैं कि पौधा बदलते माहौल में पानी और हवा के इस संतुलन को कैसे साधता है।

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'स्टोमेटा इन-साइट': तीन तकनीकों का संगम
इस मशीन को तैयार करने के लिए तीन अलग-अलग उपकरणों को एक साथ जोड़ा गया है:

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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लेजर माइक्रोस्कोप: यह बिना पत्ती को नुकसान पहुंचाए या उसे काटे, उसकी गहराई तक जाकर 3D तस्वीरें लेता है।

गैस सेंसर: यह ठीक उसी समय हवा के प्रवाह को मापता है, जिससे पता चलता है कि कितनी गैस अंदर गई और कितना पानी बाहर निकला।

सील्ड चैंबर: यह पत्ती के लिए एक कृत्रिम वातावरण बनाता है, जहां तापमान 28°C और नमी 70 प्रतिशत पर स्थिर रखी जाती है, ताकि परिणाम सटीक मिलें।

मशीन लर्निंग और लेजर स्कैनिंग का जादू
इस पूरी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए 'मशीन लर्निंग' सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया है। यह सॉफ्टवेयर खुद-ब-खुद छिद्रों की पहचान कर लेता है, जिससे इंसानी मदद की जरूरत कम पड़ती है।

वहीं, लेजर स्कैनिंग कॉनफोकल माइक्रोस्कोपी (LSCM) तकनीक इसे और खास बनाती है। साधारण माइक्रोस्कोप पूरी पत्ती पर रोशनी डालकर तस्वीर धुंधली कर देते हैं, लेकिन LSCM एक केंद्रित लेजर बीम और 'पिनहोल' तकनीक का उपयोग करता है। इससे सिर्फ वही रोशनी डिटेक्टर तक पहुँचती है जो सीधे फोकस पॉइंट से आती है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि पौधों में मौजूद क्लोरोफिल लेजर की रोशनी में खुद चमकने लगते हैं, जिससे वैज्ञानिकों को किसी कृत्रिम रंग या डाई की जरूरत नहीं पड़ती।

इस रिसर्च से क्या हासिल हुआ?
मक्के की पत्तियों पर किए गए परीक्षणों ने चौंकाने वाले नतीजे दिए हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि एक ही पत्ती पर मौजूद सभी स्टोमेटा एक जैसा व्यवहार नहीं करते—कुछ जल्दी खुलते हैं तो कुछ बंद रहते हैं। यह असमान व्यवहार पहले कभी नहीं देखा गया था क्योंकि पहले हम सिर्फ 'औसत' आंकड़े ही देख पाते थे।

भविष्य के लिए क्यों है यह 'मील का पत्थर'?
यह खोज सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध हमारी थाली और पानी से है। अमेरिका जैसे देशों में सिंचाई के लिए ताजे पानी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च होता है। इस तकनीक के जरिए वैज्ञानिक अब ऐसी फसलें तैयार कर सकेंगे जो कम पानी में भी अधिक पैदावार दे सकें। यह तकनीक हमें यह समझने में मदद करेगी कि कौन सा पौधा कम पानी खर्च करके भी बेहतर विकास कर सकता है, जो भविष्य में सूखे जैसे संकटों से निपटने में दुनिया के लिए एक बड़ा हथियार साबित होगा।


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Content Editor

Anu Malhotra

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