रूस-भारत के बीच ट्रेन चलाने का प्लान; इन देशों से होकर बन सकता रूट, जानिए 7000 किमी का सफर कितने घंटे में होगा पूरा?
punjabkesari.in Monday, Aug 10, 2026 - 01:42 PM (IST)
Moscow: भारत और रूस की दोस्ती अब एक नए रेल कनेक्शन की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। रूस ने भारत और हिंद महासागर तक पहुंच बनाने के लिए वैकल्पिक रेल मार्ग तलाशने की बात कही है। रूसी उपप्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन के मुताबिक, बोस्फोरस और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री रास्तों पर निर्भरता और जोखिम कम करने के लिए भारत तक भूमि मार्ग के विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, अभी यह सिर्फ प्रस्ताव और चर्चा के स्तर पर है, कोई सीधी यात्री ट्रेन घोषित नहीं हुई है।
जानेंम क्या है प्लान?
रूस की ओर से जिस संभावित कनेक्टिविटी की बात की गई है, उसमें मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के रास्ते भारत तक पहुंचने का विकल्प शामिल है।संभावित मार्ग में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत तक पहुंच उपलब्ध कराने वाला कोई भी व्यवहारिक विकल्प तलाशा जा सकता है। लेकिन फिलहाल इस रूट की अंतिम लंबाई, ट्रैक का पूरा खाका, निर्माण लागत, समयसीमा या यात्री ट्रेन चलाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
7 हजार किलोमीटर का सफर कितने घंटे में?
अब सबसे दिलचस्प सवाल अगर भविष्य में मॉस्को से भारत तक करीब 7,000 किलोमीटर का रेल रूट बनता है, तो ट्रेन से सफर में कितना समय लगेगा?
- अगर ट्रेन लगातार 130 किमी प्रति घंटे की औसत गति से चले तो 7000 ÷ 130 = करीब 54 घंटे यानी लगभग 2 दिन 6 घंटे।
- अगर औसत गति 150 किमी प्रति घंटा हो तो 7,000 ÷ 150 = करीब 47 घंटे यानी लगभग 1 दिन 23 घंटे।
- और अगर भविष्य में ट्रेन को 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से लगातार चलाया जाए, तो करीब 44 घंटे, यानी लगभग 1 दिन 20 घंटे लगेंगे।
- लेकिन यह सिर्फ गणित है। असली अंतर्राष्ट्रीय रेल यात्रा इससे काफी लंबी होगी।
असल सफर में लग सकते इतने दिन
सीमा पार करने पर पासपोर्ट और सुरक्षा जांच, कस्टम, ट्रेन बदलना, रेल गेज में अंतर, तकनीकी जांच, स्टेशन पर ठहराव और अलग-अलग देशों के रेलवे नियम यात्रा का समय बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा 130-160 किमी प्रति घंटे की गति को पूरे 7,000 किलोमीटर तक लगातार बनाए रखना व्यावहारिक नहीं होगा। इसलिए अगर ऐसा कोई रेल कॉरिडोर बनता है, तो कुल यात्रा समय 3 से 5 दिन या उससे ज्यादा होना ज्यादा व्यावहारिक अनुमान हो सकता है। फिलहाल यह भी केवल अनुमान है, क्योंकि वास्तविक रूट और परिचालन व्यवस्था तय नहीं हुई है।
सिर्फ यात्रियों के लिए नहीं होगी यह ट्रेन
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा उद्देश्य शायद यात्री ट्रेन चलाना नहीं, बल्कि माल ढुलाई के लिए वैकल्पिक भूमि मार्ग तैयार करना होगा। रूस के लिए भारत तक रेल और सड़क के जरिए पहुंच का मतलब समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम करना हो सकता है। खासकर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव के कारण महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। रूस जिन रास्तों के जोखिम का जिक्र कर रहा है, उनमें बोस्फोरस और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण हैं।स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद अहम समुद्री चोकपॉइंट है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर यहां से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा और आवाजाही प्रभावित हो सकती है। ऐसे में रूस के लिए जमीन के रास्ते भारत और हिंद महासागर तक पहुंच का विकल्प रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
INSTC से पहले से जुड़ा है भारत-रूस कनेक्शन
भारत और रूस के बीच कनेक्टिविटी का विचार बिल्कुल नया नहीं है। दोनों देश इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC पर पहले से काम कर रहे हैं। यह एक मल्टी-मॉडल परिवहन कॉरिडोर है, जिसमें रेल, सड़क और समुद्री मार्ग शामिल हैं। रूस से ईरान होते हुए भारत तक माल पहुंचाने के विकल्पों पर पहले से काम हो चुका है। रूस से भारत जाने वाली मालगाड़ी पहले भी ईरान पहुंच चुकी है। 2022 में एक रूसी मालगाड़ी करीब 3,800 किलोमीटर की दूरी तय करके ईरान पहुंची थी और वहां से माल को आगे समुद्री मार्ग से भारत भेजने की योजना थी।
सबसे बड़ी चुनौती
अगर रेल लाइन तुर्कमेनिस्तान-ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान होकर भारत तक आती है, तो कई देशों के बीच लंबे समय तक राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग की जरूरत होगी। अफगानिस्तान में सुरक्षा परिस्थितियां, पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध, अलग-अलग देशों के रेलवे सिस्टम और सीमा पर माल व ट्रेन की आवाजाही जैसी समस्याएं इस प्रोजेक्ट को बेहद जटिल बना सकती हैं। इसके अलावा अलग-अलग देशों में रेल गेज की समस्या भी महत्वपूर्ण है। रूस और मध्य एशिया के कई हिस्सों में सोवियत-मानक चौड़ी रेल पटरी है, जबकि ईरान और अन्य हिस्सों में अलग मानक मौजूद हैं। ऐसे में सीमा पर ट्रेन बदलने या गेज बदलने की व्यवस्था करनी पड़ सकती है।
भारत-रूस को क्या फायदा होगा?
अगर ऐसा रेल कॉरिडोर वास्तव में बनता है, तो भारत के लिए मध्य एशिया और रूस तक भूमि आधारित कनेक्टिविटी का एक नया विकल्प खुल सकता है। इससे कारोबार, माल ढुलाई, लॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय व्यापार को फायदा मिलने की संभावना है। भारत के लिए यह यूरोप और मध्य एशिया तक पहुंच के अतिरिक्त विकल्प भी पैदा कर सकता है। रूस को इस रूट से हिंद महासागर और भारतीय बाजार तक पहुंच का वैकल्पिक रास्ता मिल सकता है। समुद्री मार्ग में किसी चोकपॉइंट पर संकट आने की स्थिति में भूमि आधारित कनेक्टिविटी एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है। इसी वजह से यह सिर्फ रेलवे प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीति से जुड़ी बड़ी रणनीतिक योजना के रूप में देखा जा रहा है।
क्या राजधानी या शताब्दी सीधे मॉस्को जाएगी?
यह बात सबसे ज्यादा स्पष्ट रखना जरूरी है कि भारत-रूस के बीच कोई सीधी राजधानी, शताब्दी या दूसरी यात्री ट्रेन घोषित नहीं हुई है। रूस की ओर से फिलहाल रेल कनेक्टिविटी की संभावना तलाशने की बात सामने आई है। रूट, लागत, निर्माण, सीमा व्यवस्था और यात्री सेवा से जुड़े फैसले अभी बाकी हैं। इसलिए 2 दिन, 3 दिन या 5 दिन की यात्रा का हिसाब फिलहाल केवल संभावित दूरी और ट्रेन की गति के आधार पर लगाया जा सकता है।
