आखिर कैसे बढ़े डर? जब पुलिस ही अपराध साबित करने में हो रही नाकाम

12/7/2019 11:36:15 AM

नई दिल्ली (नवोदय टाइम्स): महिलाओं के साथ रेप और उसे अपहरण की कोशिश के कई मामले देखने को मिलते हैं। इन मामलों में कई बार अपराधी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाते तो कई बार केस सुलझाने का दावा करने वाली पुलिस अदालत में अपराध को साबित नहीं कर पाती। देखने में आया है कि पुलिस हाई प्रोफाइल मामलों में तो तत्परता दिखाती है लेकिन अन्य मामलों में पुलिस की नाकामी किसी से छिपी नहीं है और यही कारण है कि रेप केसों में 70 फीसदी मामले में आरोपी साफ बच निकलते हैं। 

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जांच अधिकारी की लापरवाही
कानून के जानकारों का कहना है कि पुलिस जांच अधिकारी तफ्तीश में लापरवाही को लेकर अदालतें कई बार कड़ी टिप्पणी कर चुकी हैं। रेप केस में आरोपियों के बरी होने के पीछे जांच की लापरवाही के अलावा भी कई कारण हैं। अधिवक्ता अनिल यादव बताते हैं कि कई बार सामने आया है कि जांच अधिकारी केस को ज्यादा मजबूत बनाने के फेर में मामले को और ज्यादा खराब कर देते हैं। गवाह के जो बयान जांच अधिकरी दर्ज करता है वह गवाह द्वारा अदालत के समक्ष दिए गए बयानों से मेल नहीं खाते। बचाव पक्ष के वकील उन गवाहों के साथ जिरह करते है तो बयान संदिग्ध हो जाता है और इसका लाभ आरोपियों को मिल जाता है।

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चार्जशीट देर से दाखिल करना भी कारण
अधिवक्ता जगदीश शर्मा का कहना है कि रेप के मामलों में पुलिस कई बार महीनों बाद चार्जशीट दाखिल करती है। जबकि दो महीने के भीतर चार्जशीट दाखिल होनी चाहिए। अगर समय पर चार्जशीट हो और सुनवाई शुरू हो जाए तो पीड़िता बयान के दौरान ज्यादा तटस्थ रहती है क्योंकि घटना जब ज्यादा पुरानी न हो तो पीड़िता के भीतर एक जज्बा होता है कि वह गुनहगार को सजा दिलवाएगी।

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बढ़ रहे अपराध से महिलाओं की सुरक्षा चिंता का विषय
राजधानी में इस साल 15 जुलाई तक हर रोज बलात्कार के औसतन 6 मामले और छेड़छाड़ के 8 मामले दर्ज किए गए। आंकड़े बताते हैं कि इस साल 15 जुलाई तक दुष्कर्म के कुल 1,176 मामले दर्ज किए गए हैं। राजधानी में निर्भया कांड के सात साल बाद भी महिलाओं की सुरक्षा का हाल कितना चिंताजनक है। पुलिस के मुताबिक, दुष्कर्म की ज्यादातर घटनाओं में आरोपी पीडिता के जान-पहचानने वालों में से होते हैं, पिछले साल दिल्ली पुलिस ने कहा था कि दुष्कर्म के मामलों में 43 प्रतिशत आरोपी या तो दोस्त या पारिवारिक मित्र रहे हैं, 16.25 प्रतिशत पड़ोसी, 12.04 प्रतिशत रिश्तेदार, 2.89 प्रतिशत सहकर्मी और 22.86 प्रतिशत अन्य जान पहचान वालों में से थे।


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