चीन के दबाव में झुका नेपाल; तिब्बत पर अकादमिक सम्मेलन से खींचे हाथ, काठमांडू यूनिवर्सिटी को मेजबानी से हटाया
punjabkesari.in Tuesday, Aug 11, 2026 - 07:43 PM (IST)
Kathmandu: नेपाल में तिब्बत पर होने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन को लेकर चीन का दबाव चर्चा में है। काठमांडू में 23 से 29 अगस्त तक होने वाला इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ तिब्बतन स्टडीज यानी IATS का 17वां सेमिनार अब ऑनलाइन आयोजित किया जाएगा। आयोजकों के मुताबिक नेपाल सरकार ने काठमांडू यूनिवर्सिटी को सम्मेलन की मेजबानी से पीछे हटने का निर्देश दिया। नेपाल सरकार ने सुरक्षा और समय की संवेदनशीलता का हवाला दिया है, जबकि कई रिपोर्टों में इस फैसले के पीछे चीनी राजनयिक दबाव की बात कही गई है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के अलग-अलग देशों से 700 से ज्यादा विद्वानों और शोधकर्ताओं के शामिल होने की उम्मीद थी। इसकी मेजबानी काठमांडू यूनिवर्सिटी के हिमालय सेंटर फॉर एशियन स्टडीज और सेंटर फॉर बुद्धिस्ट स्टडीज को करनी थी। सम्मेलन की तैयारियां कई वर्षों से चल रही थीं।
IATS की आधिकारिक वेबसाइट पर भी काठमांडू में 23-29 अगस्त के आयोजन की जानकारी पहले से जारी की गई थी। लेकिन अगस्त की शुरुआत में पूरा मामला अचानक बदल गया। IATS के मुताबिक नेपाल सरकार ने काठमांडू यूनिवर्सिटी को सम्मेलन की मेजबानी आगे नहीं बढ़ाने का निर्देश दिया। आयोजकों ने इसे अकादमिक कार्यक्रम में अनपेक्षित और अनुचित हस्तक्षेप बताया। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल के मुख्य सचिव गोविंद बहादुर करकी और विदेश सचिव अमृत बहादुर राय ने काठमांडू यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ अधिकारियों को सम्मेलन रद्द करने के लिए कहा था। अधिकारियों ने कथित तौर पर कार्यक्रम के समय और सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलता का हवाला दिया। हालांकि, नेपाल सरकार की ओर से आयोजकों को इस फैसले का कोई विस्तृत लिखित कारण नहीं दिया गया। यही वजह है कि सम्मेलन को लेकर अब राजनीतिक और कूटनीतिक सवाल भी उठ रहे हैं।
कई रिपोर्टों के अनुसार नेपाल सरकार के फैसले से पहले चीनी राजनयिकों की ओर से सम्मेलन को लेकर चिंता जताई गई थी। चीन तिब्बत से जुड़े राजनीतिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों को लेकर बेहद संवेदनशील रहा है। नेपाल में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी रहते हैं और काठमांडू लंबे समय से तिब्बत से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर सावधानी बरतता रहा है। IATS के मुताबिक सम्मेलन की तैयारी करीब तीन साल से चल रही थी और काठमांडू यूनिवर्सिटी की मेजबानी पर 2023 में सहमति बनी थी। कार्यक्रम में तिब्बती भाषा, इतिहास, धर्म, संस्कृति, कला, दर्शन और हिमालयी अध्ययन से जुड़े शोध पर चर्चा होनी थी।आयोजकों के लिए सबसे बड़ा झटका यह रहा कि सम्मेलन शुरू होने से कुछ ही सप्ताह पहले मेजबान संस्था को इससे हटना पड़ा।
7 अगस्त को IATS बोर्ड ने आपात बैठक की। इसके बाद बोर्ड ने खुद सम्मेलन की जिम्मेदारी संभालने और कार्यक्रम को पूरी तरह ऑनलाइन आयोजित करने का फैसला किया। आयोजकों के मुताबिक सम्मेलन का मूल अकादमिक कार्यक्रम बरकरार रहेगा और शोधकर्ता अपने-अपने स्थान से ऑनलाइन शोधपत्र प्रस्तुत कर सकेंगे। हालांकि अलग-अलग देशों के समय क्षेत्रों के कारण सभी प्रतिभागियों के लिए कार्यक्रम में शामिल होना चुनौतीपूर्ण होगा। सम्मेलन के अचानक ऑनलाइन होने के बाद नेपाल की अकादमिक स्वतंत्रता और चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं। एक पश्चिमी राजनयिक ने काठमांडू पोस्ट से बातचीत में चिंता जताई कि इस फैसले से नेपाल की संप्रभुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
