Exclusive Interview: कोविड में शुरू हुआ आइडिया 2023 में मिला चेहरा: सुरेश त्रिवेणी
punjabkesari.in Monday, Feb 09, 2026 - 12:24 PM (IST)
नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। अमेज़न प्राइम वीडियो की नई क्राइम-ड्रामा सीरीज़ ‘दलदल’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। सीरीज़ में भूमि पेडनेकर एक ऐसी पुलिस अधिकारी के किरदार में नज़र आ रही हैं, जो कम बोलती है लेकिन जिसकी आंखें बहुत कुछ कह जाती हैं। सीरीज ‘दलदल’ को डायरेक्टर अमृतराज गुप्ता ने डायरेक्ट किया है। इस सीरीज में भूमि पेडनेकर के अलावा आदित्य रावल, समारा तिजोरी भी नजर आ रहे हैं। इस सीरीज के बारे में आदित्य रावल, समारा तिजोरी और इस सीरीज के क्रिएटर सुरेश त्रिवेणी ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...
सुरेश त्रिवेणी
सवाल: इस शो दलदल की शुरुआत कैसे और कब हुई?
जवाब: कोविड के दौरान विक्रम सर ने विश्व धमीजा की एक किताब पढ़ी थी, जिसके राइट्स उन्होंने लिए। उस वक्त इंडस्ट्री में काम थोड़ा स्लो था, तो हमने सोचा कि कुछ नया शुरू किया जाए। मैंने एक राइटर्स टीम बनाई। शुरुआत में मैं सीरीज़ को लेकर थोड़ा hesitant था, क्योंकि यह जॉनर काफी demanding होता है, लेकिन धीरे-धीरे मुझे इसमें मजा आने लगा।
सवाल: आप पहली बार शो रनर बने। शो रनर का काम क्या होता है?
जवाब: शो रनर का काम पूरे प्रोजेक्ट की ओवरऑल जिम्मेदारी लेना होता है राइटिंग से लेकर कास्टिंग, क्रू सिलेक्शन और शो की विज़न तय करना। डायरेक्टर उस विज़न को आगे ले जाता है। शो रनर का मकसद यह होता है कि कहानी शुरुआत से लेकर अंत तक बिना अपनी ऑब्जेक्टिविटी खोए पूरी हो। वह
सवाल: इस शो में भूमी पेडनेकर को कास्ट करने का कैसे सूजा?
जवाब: विक्रम ने पहली बार भूमी से किसी परियोजना के बारे में बात की थी जिसमें शुरुआत में उनकी एक छोटी सी बातचीत हुई थी। यह बात शुरू में बहुत हल्की सी थी, बस ब्रीफली। उसके बाद, लिखते-लिखते और डिलीट करते करते काफी समय निकल गया। फिर 2023 में, विक्रम ने भूमी से फिर से संपर्क किया और इस बार भूमी ने खुशी-खुशी सहमति दे दी। वह उनके साथ कोलैबोरेट करने के लिए उत्साहित थीं और इसे लेकर बहुत सकारात्मक थीं।
समारा तिजोरी
सवाल: आपने साइकोलॉजी पढ़ी है, क्या इससे एक्टिंग में मदद मिली?
जवाब: बहुत ज्यादा। खासकर इस किरदार के लिए। साइकोलॉजी पढ़ने से आप ज्यादा empathetic बनते हैं। आप समझ पाते हैं कि कोई इंसान ऐसा क्यों कर रहा है, उसका ट्रॉमा क्या है। ऐसे किरदारों के माइंडसेट में घुसना आसान नहीं होता, लेकिन पढ़ाई और रिसर्च से बहुत मदद मिलती है। इसलिए मैंने काफी पढ़ा और रिसर्च किया। थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन करने से हो जाता है।
सवाल: क्या आप किरदार को घर तक ले जाती थीं और थोड़ा अपने किरदार के बारे में भी बताइए?
जवाब: नहीं। मैं सेट पर किरदार में पूरी तरह घुस जाती थी, लेकिन घर जाकर खुद को उससे अलग कर लेती थी। यह किरदार थोड़ा डेंजरस भी था, इसलिए उसे साथ लेकर चलना सही नहीं लगता था। मेकअप, कॉस्ट्यूम और फिजिकल लुक ने भी बहुत मदद की। हर सीन को हमने बीट-बाय-बीट डिस्कस किया। दिमाग में क्या चल रहा है, क्या नहीं दिखाना है सब कुछ। कई बार साइलेंस ही सबसे ज्यादा बोलता है।
सवाल: इस शो में आपकी कास्टिंग कैसे हुई?
जवाब: मेरा ऑडिशन मुकेश सर ने लिया था। मेरा ऑडिशन प्रोसेस काफी अलग था। मुझे सिर्फ 5-6 लाइनों का एक first-person ब्रीफ दिया गया था कि मैं कौन हूं। पहले राउंड में कोई सीन नहीं था, बस इंटरव्यू था, लेकिन मैं ‘अनीता’ बनकर जवाब दे रही थी। यह बहुत इंटरेस्टिंग अनुभव था। दूसरे राउंड में सीन दिए गए।
आदित्य रावल
सवाल: शो में आपके और समारा के किरदारों के बीच जो बदलाव आता है, उसे आपने कैसे समझा?
जवाब: यह शिफ्ट पूरी तरह से राइटिंग के हिसाब से रखा गया था। समारा के साथ काम करना पहले दिन से ही बेहद आसान और मजेदार रहा। लुक टेस्ट के दौरान ही हमें महसूस हो गया था कि हमारे बीच एक नेचुरल ईज़ है, जिससे स्क्रीन पर केमिस्ट्री अपने आप बन जाएगी। जहां तक किरदारों की बात है हर इंसान की अपनी एक नैतिक रेखा होती है चाहे वो कितना भी अच्छा हो, कितनी भी मुश्किलों से गुजर रहा हो। शो में समारा के किरदार की भी एक लाइन है और मेरे किरदार साजिद की भी।
सवाल: अपने किरदार साजिद के बारे में बताइए?
जवाब: साजिद किसी का साथ कितनी दूर तक दे सकता है, यह उसकी सीमाओं पर निर्भर करता है। बेशुमार मोहब्बत हो सकती है, लेकिन जब हालात उस हद को पार कर जाते हैं, तब साजिद अपने हिसाब से थोड़ा पीछे हट जाता है। यही बदलाव दर्शकों को दिखता है और यही इस रिश्ते को इतना रियल और लेयर्ड बनाता है और यह सब कुछ स्क्रिप्ट में बहुत खूबसूरती से लिखा हुआ था।
सवाल: एक स्क्रिप्ट आने पर उसे जज कैसे करते हैं कि यह रोल के लिए सही है या नहीं?
जवाब: जब एक स्क्रिप्ट आती है, तो सबसे पहले उसे समझने की कोशिश की जाती है कि उसमें किरदारों का क्या महत्व है और क्या कहानी अच्छी तरह से पेश की जा रही है। रोल को जज करते समय यह देखना होता है कि क्या उस किरदार का इंटरनल और एक्सटर्नल विकास स्क्रिप्ट के हिसाब से सटीक है और क्या राइटर ने उस किरदार को पूरी तरह से समझा है। हालांकि यह कभी-कभी मुश्किल हो सकता है, क्योंकि कई बार ऐसी परिस्थितियां सामने आती हैं जब हमें किसी सवाल का जवाब तैयार नहीं होता और हमें सीरियस चेहरे के साथ सोचना पड़ता है कि उस सवाल का उत्तर क्या हो सकता है। इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिलती है कि एक अच्छे लेखक के लिए कहानी का गहरा विश्लेषण और किरदारों को सही रूप में प्रस्तुत करना कितना जरूरी है।
सवाल: इंडस्ट्री में परिवार के बड़े नाम होने का प्रेशर रहता है?
जवाब: ईमानदारी से कहूं तो नहीं। उन्होंने 40 साल में जो हासिल किया है उसकी तुलना अभी करना बेईमानी होगी। हम अपने सफर का मजा ले रहे हैं, जब समय आएगा तब देखा जाएगा।
सवाल: पिता की फिल्म के लिए लिखने और सेट पर काम करने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: यह अनुभव सच में बहुत शानदार और मज़ेदार रहा। उनके लिए लिखना अपने आप में बहुत खास था और वह खुद भी इस प्रोसेस का हिस्सा थे इसलिए एक अलग ही तरह की समझ बन गई थी। सेट पर साफ महसूस होता है कि रिश्ता एक्टर-राइटर का ही होता है, जहां दोनों मिलकर सीन को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। एक सीन के दौरान कई टेक हुए, लेकिन जब चौथे टेक के बाद सबको लगा कि इससे बेहतर हो ही नहीं सकता तो वही पल सबसे ज़्यादा सेटिस्फाइंग था। काम के दौरान हंसी-मजाक भी चलता रहता है, कभी हल्की डांट भी पड़ जाती है, लेकिन जब तक आप पूरी मेहनत और अपनी क्षमता के हिसाब से काम कर रहे हो, तब तक कोई प्रेशर नहीं होता।
