16 की उम्र में भागकर की शादी, तीसरी प्रेग्नेंसी में घर से निकाली गईं... किसी फिल्म से कम नहीं है Asha Bhosle की जिंदगी
punjabkesari.in Sunday, Apr 12, 2026 - 02:02 PM (IST)
Asha Bhosle Life : यह कहानी संगीत की दुनिया की उस महान आवाज की है, जिन्होंने सुरों से तो दुनिया को सजाया, लेकिन उनकी निजी जिंदगी संघर्षों की आग में तपती रही।
Asha Bhosle सुरों की मलिका का संघर्षपूर्ण सफर
भारतीय संगीत जगत की स्तंभ रहीं आशा भोसले की सुरीली आवाज भले ही आज भी हमारे कानों में गूंजती है लेकिन उनके जीवन की हकीकत किसी दुखद फिल्म से कम नहीं रही। 12 अप्रैल को मुंबई के एक अस्पताल में उनके निधन की खबर ने संगीत प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया।

बचपन में ही कंधों पर आया बोझ
आशा जी का जन्म 1933 में महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। वह दिग्गज गायक दीनानाथ मंगेशकर की बेटी थीं। लेकिन नियति ने क्रूर खेल खेला और महज 9 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया। परिवार पर आए इस संकट के समय उन्होंने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ सुर से सुर मिलाए और छोटी सी उम्र में ही आजीविका के लिए गाना शुरू कर दिया।
विद्रोही प्रेम और घरेलू हिंसा का दंश
जब आशा केवल 16 साल की थीं, तब उन्होंने समाज और परिवार की परवाह किए बिना खुद से 15 साल बड़े गणपतराव भोसले से भागकर शादी कर ली। उन्होंने जिस घर के सपने देखे थे, वहां उन्हें केवल दुख और घरेलू हिंसा मिली। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान ही उन्हें ससुराल छोड़कर मायके वापस आना पड़ा। इसके बाद उन्होंने हार मानने के बजाय अकेले दम पर अपने बच्चों की परवरिश करने का फैसला किया।
अपनों को खोने का असहनीय दर्द
आशा भोसले की निजी जिंदगी में दुखों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। उन्हें वह दर्द सहना पड़ा जिसे कोई भी मां कभी नहीं सहना चाहती—अपने बच्चों का जाना।
2012: उनकी बेटी वर्षा भोसले ने खुदकुशी कर ली।
2015: उनके बड़े बेटे हेमंत भोसले का कैंसर के कारण निधन हो गया।
इन जख्मों ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था लेकिन संगीत के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें फिर से खड़ा किया। आज उनके सबसे छोटे बेटे आनंद उनके साथ साए की तरह रहते हैं।

R. D. Burman का साथ और अकेलापन
पहली शादी की कड़वाहट के करीब 20 साल बाद, उनकी जिंदगी में संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) आए। दोनों ने न केवल संगीत में क्रांति लाई, बल्कि एक-दूसरे का सहारा भी बने। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, पंचम दा के असामयिक निधन ने आशा जी को फिर से तन्हा कर दिया।
