अमर कथा का रहस्य सुनाने से पहले महादेव ने क्यों तोड़ दिए सारे सांसारिक बंधन, जानें इसके पीछे की पूरी कहानी
punjabkesari.in Saturday, Jun 13, 2026 - 11:44 AM (IST)
भगवान शिव से जुड़ी अनेक कथाएं और रहस्य ऐसे हैं, जो आज भी लोगों को आश्चर्य में डाल देते हैं। उन्हीं में से एक रहस्य जुड़ा है अमरनाथ गुफा में सुनाई गई अमर कथा से। कहा जाता है कि माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताने से पहले भगवान शिव ने एक ऐसा निर्णय लिया था, जिसे जानकर हर कोई हैरान रह जाता है। क्या आप जानते हैं कि अमर कथा सुनाने के लिए जाते समय भगवान शिव ने अपने प्रिय वाहन नंदी को छोड़ दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने भगवान गणेश, अपने नाग, चंद्रमा और यहां तक कि पंचतत्वों का भी त्याग कर दिया था। लेकिन आखिर इसकी क्या वजह थी और आखिर भगवान शिव ने ऐसा कौन-सा रहस्य सुनाने का निश्चय किया था, जिसे कोई अन्य जीव सुन न सके। तो आइए जानते हैं भगवान शिव के दुनिया को त्याग ने के पूछे की कहानी के बारे में-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक दिन माता पार्वती की नजर भगवान शिव के गले में विराजमान मुंडमाला पर पड़ी। उनके मन में जिज्ञासा जागी और उन्होंने महादेव से पूछा, स्वामी, आपके गले में यह मुंडमाला क्यों है? इसके पीछे क्या रहस्य छिपा है? माता पार्वती का प्रश्न सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, देवी, इस माला में जो मुंड हैं, वे तुम्हारे ही विभिन्न जन्मों की स्मृतियां हैं। जब-जब तुमने नया जन्म लिया, तब-तब मैंने एक और मुंड इस माला में जोड़ लिया। यह सुनकर माता पार्वती आश्चर्यचकित रह गईं। उन्होंने कहा, यदि मैं बार-बार जन्म लेती और मृत्यु को प्राप्त होती हूं, तो आप कैसे अमर हैं। मुझे भी इस रहस्य को जानने की इच्छा है।
तब भगवान शिव ने उत्तर दिया, देवी, यह साधारण रहस्य नहीं है। इसके पीछे अमरत्व का गूढ़ ज्ञान छिपा हुआ है। यदि तुम इसका वास्तविक कारण जानना चाहती हो, तो तुम्हें अमर कथा सुननी होगी। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाने का निश्चय किया। लेकिन वे जानते थे कि यह ज्ञान इतना दुर्लभ और शक्तिशाली है कि इसे किसी अन्य जीव, देवता या गण द्वारा नहीं सुना जाना चाहिए। इसलिए उन्होंने ऐसे स्थान की खोज शुरू की जहां पूर्ण एकांत हो और कोई भी जीवित प्राणी मौजूद न हो। इसी उद्देश्य से भगवान शिव माता पार्वती को लेकर हिमालय की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं की ओर चल पड़े। कहा जाता है कि यात्रा के दौरान उन्होंने अपने प्रत्येक साथी और प्रतीक को अलग-अलग स्थानों पर छोड़ना शुरू कर दिया, ताकि अमर कथा का रहस्य पूरी तरह सुरक्षित रह सके। मान्यता है कि सबसे पहले पहलगाम में उन्होंने अपने प्रिय वाहन और परम भक्त नंदी को वहीं रुकने का आदेश दिया। इसके बाद आगे बढ़ते हुए शेषनाग क्षेत्र में अपने साथ रहने वाले नागों को छोड़ दिया। फिर महागुण पर्वत के पास उन्होंने भगवान गणेश को विराम दिया। यात्रा के अंतिम चरण में पंचतरणी पहुंचकर भगवान शिव ने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंचमहाभूतों का भी प्रतीकात्मक रूप से त्याग कर दिया। माना जाता है कि ऐसा करके उन्होंने स्वयं को समस्त सांसारिक बंधनों और पहचान से मुक्त कर लिया।

अंततः लंबी और कठिन यात्रा के बाद भगवान शिव और माता पार्वती एक निर्जन गुफा तक पहुंचे, जहां चारों ओर केवल बर्फ, सन्नाटा और हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखलाएं थीं। यही पवित्र स्थान आगे चलकर अमरनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि वहां कोई भी जीवित प्राणी मौजूद न रहे, अपनी दिव्य शक्ति से पूरे क्षेत्र को निर्जन बना दिया। इसके बाद वे माता पार्वती के साथ गुफा में विराजमान हुए और अमरत्व, जीवन, मृत्यु तथा सृष्टि के रहस्यों से जुड़ी अमर कथा सुनाना शुरू कर दिया। भगवान शिव को पूर्ण विश्वास था कि वहां कोई भी अन्य जीव उपस्थित नहीं है। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
लोककथाओं के अनुसार, गुफा के एक कोने में कबूतरों का एक जोड़ा छिपा हुआ था। वे अनजाने में भगवान शिव द्वारा सुनाई जा रही पूरी अमर कथा सुन बैठे। कहा जाता है कि उस दिव्य ज्ञान को सुनने के कारण वे साधारण पक्षी नहीं रहे और उन्हें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हुआ। यही वजह है कि अमरनाथ से जुड़ी मान्यताओं में उन अमर कबूतरों का उल्लेख आज भी किया जाता है। कई श्रद्धालु दावा करते हैं कि उन्हें अमरनाथ गुफा के आसपास कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है। अत्यधिक बर्फबारी, कठिन मौसम और कड़ाके की ठंड के बावजूद इन पक्षियों का वहां दिखाई देना भक्तों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता।
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