Sawan Mangla Gauri Vrat Katha: पति की लंबी उम्र और वैवाहिक बाधाओं के नाश हेतु पढ़ें या सुनें सावन मंगलागौरी व्रत कथा
punjabkesari.in Monday, Aug 03, 2026 - 10:54 AM (IST)
Sawan Mangla Gauri Vrat: सनातन धर्म में सावन के महीने का विशेष महत्व है, जहां सोमवार भगवान शिव को समर्पित है, वहीं सावन के मंगलवार माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा के लिए अत्यंत फलदायी माने जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से न केवल वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, बल्कि मंगल दोष के अशुभ प्रभावों से भी मुक्ति मिलती है।

Why is the Mangala Gauri Vrat observed क्यों रखा जाता है मंगला गौरी व्रत?
मंगला गौरी का व्रत मुख्य रूप से महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, बेहतर स्वास्थ्य और संतान प्राप्ति की कामना के लिए रखती हैं। माना जाता है कि मां मंगला गौरी की कृपा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।

Mangla Gauri Vrat Katha मंगलागौरी व्रत कथा: बहुत समय पहले की बात है, विदर्भ देश में एक कन्या रहती थी, नाम था सौम्या। उसका विवाह एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। सौम्या को उसकी सास ने पहले दिन ही समझा दिया: “हमारे कुल में मंगला गौरी व्रत पीढ़ियों से चलता आ रहा है, इसे निभाना तुम्हारा कर्तव्य है।”
सौम्या ने व्रत को पूरी श्रद्धा से किया। उसने पहले वर्ष नियमित चार मंगलवारों को निर्जल उपवास, गौरी पूजन, कथा श्रवण और रातभर दीपक जलाकर व्रत संपन्न किया।
पहले वर्ष के अंत में, जब उसकी सासु मां को गंभीर बुखार हुआ और वैद्य भी कुछ नहीं कर सके, तब सौम्या ने मां गौरी से प्रार्थना की, “हे मां! आपने कहा है जो भक्त सच्चे भाव से व्रत करे, उसकी रक्षा करती हैं। मेरी सासु मां को बचा लो। मैं हर साल आपका व्रत करूंगी।”
उस रात सौम्या को स्वप्न में मां गौरी के दर्शन हुए। मां ने कहा, “तुमने जो पहले मंगलागौरी व्रत किया, वह तुम्हारी भक्ति का प्रमाण है। यह दूसरा वर्ष है, यह निष्ठा की परीक्षा का समय है। इस वर्ष यदि तुम बिना दिखावे, केवल श्रद्धा से पूजन करोगी, तो मैं तुम्हारे कुल की रक्षा करूंगी।”
सौम्या ने दूसरे मंगलागौरी व्रत का संकल्प लिया। इस बार उसने कोई दिखावा नहीं किया न ही पड़ोसियों को बुलाया, न ही कोई आडंबर। बस मां की मूर्ति के सामने दीप जलाकर घंटों बैठी रही, आंखें बंद कर मां का ध्यान करती रही। पूरे व्रत में उसका मन बस मां गौरी की छवि में था।
अंतिम मंगलवार को पूजा के समय तेज आंधी आई, दीपक बुझने लगा। सारा घर डर गया। सौम्या ने मां से कहा, “मां! यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो यह दीपक आज नहीं बुझेगा।”
और सचमुच, सारे दीप बुझ गए लेकिन मां गौरी के सामने जो एक दीपक सौम्या ने अपनी सांस रोककर लगाया था, वह जलता रहा।
उस रात मां फिर स्वप्न में प्रकट हुई और कहा: “तूने जो दूसरे वर्ष में निष्ठा और एकाग्रता से व्रत किया, उसी ने मुझे सबसे ज्यादा प्रसन्न किया। मैं वचन देती हूं । तुम्हारे कुल में किसी स्त्री का सुहाग कभी न टूटेगा और संतानें तेजस्वी होंगी।”
तभी से यह माना जाता है कि मंगलागौरी व्रत का दूसरा वर्ष सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह श्रद्धा की परीक्षा का वर्ष होता है। जो महिला इस वर्ष भी पूरे मन और आत्मा से व्रत करती है, उसे मां गौरी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

Sawan Mangla Gauri Vrat Katha सावन मंगलागौरी व्रत कथा: एक पौराणिक कथा अनुसार, एक समय कुरु देश में श्रुतिकीर्ति नामक एक बहुत ही प्रसिद्ध राजा रहता था। वह बहुत ही दयावान, दयालु और अनेक कलाओं में निपुण था। उस के राज्य में समस्त प्रजा बहुत सुखी थी परन्तु राजा बहुत ही दुखी और परेशान था क्योंकि उसके कोई पुत्र संतान नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा ने कई तप-जप और अनुष्ठान किए, जिस से प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने राजा को एक पुत्र वरदान स्वरूप दिया लेकिन उस का जन्म के साथ उसके मरण की भी भविष्यवाणी कर दी की तुम्हारा पुत्र सोलह वर्ष तक ही जीवित रहेगा।
भगवान शिव के आशीर्वाद से समयानुसार रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिस का नाम चिरायु रखा गया। जैसे-जैसे चिरायु बड़ा होने लगा राजा और रानी को अपने पुत्र की अकाल मृत्यु की चिंता सताने लगी। राजा ने अपने राज्य के विद्वानों को बुला कर अपनी चिंता बताई। विद्वानों के सुझाव अनुसार राजा ने चिरायु का विवाह एक ऐसी कन्या से कर दिया जो मंगला गौरी का व्रत करती थी। मंगला गौरी के व्रत के आशीर्वाद से उस कन्या का सौभग्य अखंड हुआ और लम्बी आयु वाले वर की प्राप्ति हुई। इस प्रकार राजा ने अपने पुत्र के जीवन की रक्षा की।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
