Sawan Somwar Vrat Katha: सावन सोमवार व्रत कथा पढ़ने और सुनने से होती हैं मनोकामनाएं पूरी, आप भी पढ़ें
punjabkesari.in Saturday, Aug 01, 2026 - 10:09 AM (IST)
Sawan Somwar Vrat Katha 2026: हिंदू धर्म में श्रावण मास यानी सावन के महीने का विशेष महत्व है। बारह महीनों में सबसे प्रिय माना जाने वाला यह मास पूर्णतः भगवान शिव को समर्पित है। मान्यताओं के अनुसार, सावन के सोमवार का व्रत रखने और विधि-विधान से शिव पूजन करने से न केवल जीवन की दरिद्रता दूर होती है, बल्कि भक्तों को सुख-समृद्धि और मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। इस पवित्र महीने में शिव कथाओं का श्रवण करना अत्यंत फलदायी माना गया है। पौराणिक ग्रंथों में ऐसी कई कथाओं का वर्णन है जो महादेव की असीम महिमा और उनके दयालु स्वरूप को दर्शाती हैं। कहा जाता है कि जो भक्त सावन सोमवार के दिन इन कथाओं को पढ़ते या सुनते हैं, भोलेनाथ उनकी हर मनोकामना शीघ्र पूरी करते हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं इन चमत्कारी कथाओं के बारे में जो आपके जीवन में भक्ति और विश्वास की नई ज्योति जगाएंगी।

Sawan Somwar Vrat Katha: सावन सोमवार व्रत कथा के अनुसार, एक बार की बात है, एक गरीब ब्राह्मण था जो अपने परिवार के साथ बहुत कष्ट में जी रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। उसने सोचा कि उसकी समस्याओं का समाधान केवल भगवान शिव की कृपा से ही हो सकता है, इसलिए उसने सावन के महीने में सोमवार का व्रत रखने का निर्णय किया।
ब्राह्मण ने पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ सोमवार के दिन उपवास किया और शिवलिंग पर दूध, जल, बेलपत्र और पुष्प अर्पित किए। उसने व्रत के दौरान भगवान शिव से प्रार्थना की कि उसकी दरिद्रता दूर हो और उसके परिवार को सुख-समृद्धि प्राप्त हो।
सावन के सोमवार की पूजा के प्रभाव से ब्राह्मण की भक्ति और विश्वास ने भगवान शिव को प्रसन्न कर दिया। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसकी दरिद्रता को दूर कर दिया। धीरे-धीरे ब्राह्मण की आर्थिक स्थिति सुधर गई और उसे अपने जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त हुई।

Story Of Sawan Monday fast: एक बार सावन के महीने में अनेक ऋषि क्षिप्रा नदी में स्नान कर उज्जैन के महाकाल शिव की अर्चना करने हेतु एकत्र हुए। वहां अभिमानी वेश्या भी अपने कुत्सित विचारों से ऋषियों को धर्मभ्रष्ट करने चल पड़ी। किंतु वहां पहुंचने पर ऋषियों के तप बल के प्रभाव से उसके शरीर की सुगंध लुप्त हो गई। वह आश्चर्यचकित होकर अपने शरीर को देखने लगी। उसे लगा उसका सौंदर्य भी नष्ट हो गया। उसकी बुद्धि परिवर्तित हो गई। उसका मन विषयों से हट गया और भक्ति मार्ग पर बढ़ने लगा। उसने अपने पापों के प्रायश्चित हेतु ऋषियों से उपाय पूछा, वे बोले- ‘तुमने सोलह श्रृंगारों के बल पर अनेक लोगों का धर्मभ्रष्ट किया, इस पाप से बचने के लिए तुम सोलह सोमवार व्रत करो और काशी में निवास करके भगवान शिव का पूजन करो।’
वेश्या ने ऐसा ही किया और अपने पापों का प्रायश्चित कर शिवलोक पहुंची। ऐसा माना जाता है कि सोलह सोमवार के व्रत से कन्याओं को सुंदर पति मिलते हैं तथा पुरुषों को सुंदर पत्नी की प्राप्ति होती है। बारह महीनों में विशेष है श्रावण मास, इसमें शिव की पूजा करने से प्रायः सभी देवताओं की पूजा का फल मिल जाता है।
सावन सोमवार का व्रत और पूजा भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। इस दिन विशेष रूप से शिवलिंग की पूजा और व्रत करके भक्त अपनी समस्याओं का समाधान और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति कर सकते हैं।

Sawan Somvar Katha: सावन सोमवार की पौराणिक कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था और वह बहुत बड़ा शिव भक्त था। लेकिन वह बहुत दुखी रहता था, क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था। दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा। पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी और उसकी पत्नी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करते थे। उनकी भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- 'हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।'
इसके बावजूद पार्वती जी नहीं मानी। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा कि आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।'
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई। भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया। लेकिन उस बालक की कम उम्र का रहस्य किसी ओर को पता नहीं था।
जब उसका पुत्र 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने उसके मामा को बुलाया और कहा कि शिक्षा प्राप्त करने के लिए इसे वाराणसी छोड़ आओ। रास्ते में जहां भी रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जाएं।
लंबी यात्रा के बाद वे लोग एक नगर में पहुंचे तो वहां उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इन्कार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी। वर के पिता ने उस सुंदर व्यापारी के बालक को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा। मामा ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। उस बालक को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
उस बालक ने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर वह बालक अपने मामा के साथ वाराणसी पहुंच गया। उसने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया। जब उसकी आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वती जी ने भगवान से कहा- 'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।'
भगवान शिव ने पार्वती जी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर देखा तो पार्वतीजी से बोले- 'पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
पार्वती जी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा। शिक्षा समाप्त करके वह बालक अपने मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी बालक ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा। राजा ने उस बालक को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अपने जमाई और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
मामा ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे को जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ। व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रत कथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।'
कहते हैं कि जो कोई भी इस कथा को पढ़ता या सुनता है, भोलेनाथ उसकी हर मनोकामना को जल्दी पूरा करते हैं।

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