विनायक चतुर्थी: इस मंत्र में स्वर्ग को भी जीतने की शक्ति है, पढ़ें कथा

2019-11-29T07:53:05.51

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कल यानि 30 नवंबर को मासिक विनायक चतुर्थी है। कहते हैं इस दिन गणेश जी की कथाएं और लीलाएं सुननी और पढ़नी चाहिए। ऐसे करने से आम जनमानस को पता चलता है की बप्पा अपने भक्तों की किसी भी प्रार्थना को नज़र अंदाज नहीं करते। आइए पढ़ें, गणपति महाराज से जुड़ी ये पौराणिक कथा-

PunjabKesari Vinayaka Chaturthi

मदासुर नाम का एक बलवान पराक्रमी दैत्य था। वह महर्षि च्यवन का पुत्र था। एक बार वह अपने पिता से आज्ञा लेकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गया। उसने शुक्राचार्य से कहा कि आप मुझे कृपापूर्वक अपना शिष्य बना लें। मैं सारे ब्रह्मांड का स्वामी बनना चाहता हूं। आप मेरी इच्छा पूरी करने के लिए मेरा मार्गदर्शन करें। शुक्राचार्य ने संतुष्ट होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। आचार्य ने उसे विधि सहित एकाक्षरी (ह्रीं) शक्ति मंत्र दिया।

मदासुर अपने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम कर जंगल में तप करने के लिए चला गया। उसने भगवती का ध्यान करते हुए हजारों वर्षों तक कठोर तप किया। यहां तक कि उसका शरीर दीमकों की बांबी बन गया। उसके चारों ओर वृक्ष उग गए और लताएं फैल गईं। उसके कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवती प्रकट हुईं। माता जी ने उसे निरोग रहने तथा सारे ब्रह्मांड का राज्य प्राप्त होने का वरदान दिया।

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मदासुर ने पहले सारी धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर स्वर्ग पर चढ़ाई की। इंद्र आदि देवताओं को जीत कर वह स्वर्ग का भी शासक बन बैठा। उसने प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया। उससे उसे तीन पुत्र हुए। उसने शूलपाणि भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। सभी तरफ असुरों का क्रूर शासन चलने लगा। पृथ्वी पर सारे धर्म-कर्म खत्म होने लगे। देवताओं एवं मुनियों के दु:ख की सीमा न रही। हर तरफ हाहाकार मच गया।

चिन्तित देवता सनत्कुमार के पास गए तथा उनसे उस असुर के विनाश एवं धर्म स्थापना का उपाय पूछा। सनत्कुमार ने कहा, ‘‘देवगण! आप लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान एक दंत की उपासना करें। वे संतुष्ट होकर अवश्य ही आप लोगों का मनोरथ पूर्ण करेंगे।’’ 

महर्षि के उपदेशानुसार, देवगण एकदंत की उपासना करने लगे। तपस्या के सौ वर्ष पूरे होने पर मूषक वाहन भगवान एकदंत प्रकट हुए तथा वर मांगने के लिए कहा। देवताओं ने निवेदन किया, ‘‘प्रभो! मदासुर के शासन में देवगण स्थान भ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गए हैं। आप हमें इस कष्ट से मुक्ति दिलाकर अपनी भक्ति प्रदान करें।’’

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उधर देवर्षि ने मदासुर को सूचना दी कि भगवान एकदंत ने देवताओं को वरदान दिया है। अब वे तुम्हारा प्राण-हरण करने के लिए तुमसे युद्ध करना चाहते हैं। मदासुर क्रोधित होकर अपनी विशाल सेना के साथ एकदंत से युद्ध करने चला। भगवान एकदंत रास्ते में ही प्रकट हो गए। राक्षसों ने देखा कि भगवान एकदंत सामने से चले आ रहे हैं। वह मूषक पर सवार हैं। उनकी आकृति बहुत भयानक है। उनके हाथों में परशु, पाश आदि शस्त्र हैं। उन्होंने असुरों से कहा कि तुम अपने स्वामी से कह दो यदि वह जीवित रहना चाहता है, तो देवताओं से नाराज़गी छोड़ दे। उनका राज्य उन्हें वापस कर दे। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो मैं निश्चित ही उसका वध करूंगा। महाक्रूर मदासुर युद्ध के लिए तैयार हो गया। जैसे ही उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि भगवान एकदंत का तीव्र परशु उसे लगा और वह बेहोश होकर गिर गया।

बेहोशी टूटने पर मदासुर समझ गया कि यह परमात्मा ही हैं। उसने हाथ जोड़ कर स्तुति करते हुए कहा कि प्रभो! आप मुझे क्षमा कर अपनी भक्ति प्रदान करें। एकदंत ने प्रसन्न होकर कहा कि जहां मेरी पूजा आराधना हो, वहां तुम कदापि मत जाना। आज से तुम पाताल में रहोगे।

देवता भी प्रसन्न होकर एकदंत की स्तुति करके अपने लोक चले गए।


Niyati Bhandari

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