Vasant Panchami 2026: मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस, जानें वसंत पंचमी का धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा और ऐतिहासिक घटनाएं
punjabkesari.in Friday, Jan 23, 2026 - 08:20 AM (IST)
Vasant Panchami 2026: माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि वसन्त पंचमी को सचरारचर जगत में ज्ञान, संगीत तथा कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। ब्राह्मण-ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं।

ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्विनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघ मास की पंचमी तिथि निर्धारित की गई है। ऋग्वेद में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है। मां सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं।
बिना ज्ञान और विवेक से सृष्टि का कोई भी कार्य संपादित नहीं हो सकता। मां सरस्वती की भक्तिपूर्वक आराधना करने से हमारे जीवन के अविद्या जनित विकार दूर हो जाते हैं। स्वयं विधाता ब्रह्मा जी भी ज्ञान और विवेक के अभाव में सृष्टि निर्माण में असमर्थ थे। वैदिक सनातन परंपरा में मां सरस्वती के जन्मोत्सव पर बालक का विद्या आरम्भ संस्कार किया जाता है। माघ शुक्ल पञ्चमी विद्यारम्भ की मुख्य तिथि है।

मां सरस्वती जी का प्राकट्य भगवान श्री कृष्ण जी के कण्ठ से माघ शुक्ल पंचमी को हुआ। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वसंत पंचमी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने मां सरस्वती को वरदान दिया था कि प्रत्येक बह्मांड में माघ शुक्ल पंचमी के दिन विद्या आरम्भ के शुभ अवसर पर बड़े गौरव के साथ तुम्हारी विशाल पूजा होगी।
मेरे वर के प्रभाव से आज से लेकर प्रलयपर्यन्त प्रत्येक कल्प में मनुष्य, मनुगण, देवता, मोक्षकामी, वसु, योगी, सिद्ध, नाग, गन्धर्व और राक्षस -सभी बड़ी भक्ति के साथ तुम्हारी पूजा करेंगे।
पूजा के पवित्र अवसर पर विद्वान पुरुषों के द्वारा तुम्हारा सम्यक् प्रकार से स्तुति-पाठ होगा। वे कलश अथवा पुस्तक में तुम्हें आवाहित करेंगे। इस प्रकार कहकर सर्वपूजित भगवान श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की पूजा की, तत्पश्चात ब्रह्माजी, भगवान विष्णु ,भगवान शिव और इंद्र आदि देवताओं ने भगवती सरस्वती की आराधना की- शुक्लवर्ण वाली,संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अंधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा मां सरस्वती देवी की मैं वंदना करता हूं।

परब्रह्म परमात्मा से सम्बन्ध रखने वाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की जो अधिष्ठात्री देवी हैं, उन्हें ‘सरस्वती’ कहा जाता है । सम्पूर्ण विद्याएं उन्हीं के स्वरूप हैं। मनुष्यों को बुद्धि, कविता, मेधा, प्रतिभा और स्मरण शक्ति उन्हीं की कृपा से प्राप्त होती हैं। वह चारों वेदों की माता हैं। छन्द और वेदांग भी उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। संध्या-वन्दन के मन्त्र और तन्त्रों की जननी भी वही हैं। द्विजातिवर्णों के लिए उन्होंने अपना यह रूप धारण किया है। वह जगद्रूपा, तपस्विनी, ब्रह्मतेज से सम्पन्न तथा सबका संस्कार करने वाली हैं। वसन्त पंचमी के दिन से ही वसंत ऋतु प्रारम्भ होती है।
एक सहस्र वर्ष तक परतंत्र रही भारत भूमि विदेशी आक्रांताओं से त्रस्त रही। अनेकों ऐसी घटनाएं हुईं जो वसन्त पंचमी से जुड़ गईं। लाहौर निवासी बालक वीर हकीकत राय जी ने वसन्त पंचमी के दिन वैदिक हिन्दू सनातन धर्म की रक्षार्थ अपने शीश का बलिदान दिया और अमर हो गए। भगवान श्रीराम वसन्त पंचमी के दिन ही शबरी के आश्रम में पधारे थे।
गौरक्षा, स्वदेशी व नारी उद्धार के प्रेरणास्रोत सत्गुरु राम सिंह जी का जन्म भी वसन्त पंचमी के दिन हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गौरक्षा तथा नारी रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।

हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते महान कवि तथा लेखक सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म भी वसंत पंचमी को ही हुआ था।
वसन्त पंचमी को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। मुख्यत: विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए वसन्त पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है।
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Content Writer
Niyati Bhandari