Sheetala Saptami 2026 : शीतला माता की पूजा कैसे करें ? जानें शुभ मुहूर्त और जरूरी सामग्री
punjabkesari.in Monday, Mar 09, 2026 - 03:50 PM (IST)
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Sheetala Saptami 2026 : हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी का विशेष महत्व माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 10 मार्च, मंगलवार को मनाया जाएगा। कई स्थानों पर इसे बसोड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भक्त माता शीतला की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। परंपरा के अनुसार माता को बासी यानी एक दिन पहले बना हुआ ठंडा भोजन भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
कई क्षेत्रों में लोग शीतला सप्तमी के बजाय शीतला अष्टमी को पूजा करते हैं। जो लोग अष्टमी के दिन पूजा करते हैं, वे सप्तमी के दिन भोग का भोजन तैयार करते हैं। वहीं जो लोग सप्तमी को पूजा करते हैं, वे भोग षष्ठी तिथि को ही बना लेते हैं। इसी परंपरा के अनुसार इस वर्ष शीतला सप्तमी के लिए भोग 9 मार्च 2026 को तैयार किया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाना चाहिए और भोजन नहीं बनाना चाहिए। इसलिए पूजा के लिए सभी व्यंजन एक दिन पहले ही बना लिए जाते हैं। माता शीतला को खासतौर पर चावल और घी का भोग अर्पित किया जाता है।

शीतला सप्तमी 2026: तिथि और पूजा मुहूर्त
पूजा का समय: 10 मार्च 2026, सुबह 06:37 बजे से शाम 06:26 बजे तक
सप्तमी तिथि प्रारंभ: 9 मार्च 2026, रात 11:27 बजे
सप्तमी तिथि समाप्त: 11 मार्च 2026, रात 01:54 बजे
शीतला सप्तमी की पूजा सामग्री
इस दिन पूजा के लिए कुछ विशेष सामग्रियों की आवश्यकता होती है, जैसे रोली, मौली, आम के पत्ते, जल से भरा कलश, चावल, हल्दी, फूल, वस्त्र, एक दीपक, होली के बड़कुले की माला, सिक्के, नीम की पत्तियां और भोग के लिए तैयार किए गए व्यंजन।
शीतला सप्तमी व्रत कथा
धार्मिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक वृद्ध महिला और उसकी दो बहुओं ने शीतला सप्तमी का व्रत रखा। परंपरा के अनुसार सभी को बासी भोजन ही खाना था, इसलिए घर में भोजन एक दिन पहले ही बना लिया गया था।
लेकिन दोनों बहुओं को हाल ही में संतान हुई थी। उन्हें डर था कि ठंडा भोजन खाने से उनके बच्चे बीमार पड़ सकते हैं। इसलिए उन्होंने बासी भोजन न खाकर उसी दिन ताजा रोटी बनाकर चूरमा तैयार किया और वही खा लिया। उन्होंने सास से भी इस बात को छिपा लिया।
उनके इस नियम तोड़ने से माता शीतला नाराज़ हो गईं और उनके नवजात बच्चों की मृत्यु हो गई। जब सास को सच्चाई पता चली तो उसने बहुओं को घर से निकाल दिया। दुखी होकर दोनों अपने बच्चों के शव लेकर एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गईं।
कुछ समय बाद वहां ओरी और शीतला नाम की दो बहनें आईं, जो सिर में जुओं से परेशान थीं। दोनों बहुओं ने दया दिखाते हुए उनके सिर से जुएं निकाल दीं। इससे उन्हें राहत मिली और उन्होंने बहुओं को आशीर्वाद दिया कि उनकी गोद फिर से भर जाए।
जब बहुओं ने अपना दुख बताया, तब उन बहनों ने बताया कि पाप कर्म का फल अवश्य मिलता है। तभी बहुओं को समझ आया कि वे स्वयं माता शीतला हैं। उन्होंने माता से क्षमा मांगी और अपने अपराध के लिए पश्चाताप किया। उनकी सच्ची प्रार्थना देखकर माता का हृदय पिघल गया और उन्होंने उनके मृत बच्चों को फिर से जीवित कर दिया।
इस चमत्कार के बाद पूरे गांव में माता शीतला की महिमा फैल गई और तब से लोग श्रद्धा के साथ शीतला सप्तमी का व्रत और पूजा करने लगे।

शीतला सप्तमी पूजा विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठकर ठंडे जल से स्नान करना चाहिए।
इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर माता शीतला की पूजा करनी चाहिए।
पूजा में एक दिन पहले बने भोजन का भोग अर्पित किया जाता है।
पूजा के दौरान शीतला सप्तमी की कथा अवश्य सुननी या पढ़नी चाहिए।
अंत में माता की आरती करें और उनसे परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
कई स्थानों पर रात में माता का जागरण भी किया जाता है।
विशेष ध्यान रखें कि कुछ परंपराओं में माता की पूजा के समय दीपक नहीं जलाया जाता।
यदि घर में माता की प्रतिमा न हो तो एक मिट्टी के मटके पर स्वास्तिक बनाकर उसकी पूजा की जाती है।
शीतला सप्तमी का भोग
शीतला सप्तमी के लिए भोग के सभी व्यंजन एक दिन पहले ही बनाए जाते हैं। इसमें आमतौर पर मीठे चावल, पूड़ी, बेसन की सब्जी, गुजिया, दही-बड़े आदि शामिल होते हैं। हालांकि इस दिन का मुख्य भोग दही, मीठे चावल और मालपुआ माना जाता है। अगले दिन माता को भोग अर्पित करने के बाद परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

