Ujjain mahakal mandir news : क्यों नवसंवत्सर पर महाकाल को कराया जाता है नीम के जल से स्नान ? जानिए इस दिव्य परंपरा का राज

punjabkesari.in Monday, Mar 16, 2026 - 01:23 PM (IST)

Ujjain Mahakal Mandir News : उज्जैन की पावन नगरी में जब हिंदू नववर्ष का सूर्योदय होता है, तो विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान श्री महाकालेश्वर के दरबार में एक अनूठी और प्राचीन परंपरा का निर्वाह किया जाता है। चैत्र मास की प्रतिपदा यानी गुड़ी पड़वा के दिन बाबा महाकाल को शीतल नीम के जल से स्नान कराया जाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और भक्ति के अद्भुत मिलन का प्रतीक है। जहां एक ओर यह परंपरा भीषण गर्मी के आगमन पर महादेव को शीतलता प्रदान करने की भावना से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर यह आयुर्वेद के उस गहन ज्ञान को भी दर्शाती है जो हमें ऋतु परिवर्तन के दौरान स्वस्थ रहने का मार्ग बताता है। तो आइए जानते हैं कि हिंदू नववर्ष के दिन क्यों महाकाल को नीम से स्नान करवाया जाता है। 

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क्यों करवाया जाता है महाकाल को नीम से स्नान ? 

ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य का संदेश
नवसंवत्सर के साथ ही चैत्र मास और ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) का आगमन होता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय मौसम बदलने से शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ता है, जिससे बीमारियां होने का खतरा रहता है। बाबा महाकाल को नीम से स्नान कराकर संसार को यह संदेश दिया जाता है कि इस ऋतु में नीम का उपयोग निरोगी रहने का अचूक उपाय है।

शुद्धिकरण और नकारात्मकता का नाश
नीम को आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र माना गया है। यह न केवल हवा और वातावरण को शुद्ध करता है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी दूर रखता है। भगवान शिव को कालों के काल कहा जाता है, और उन्हें नीम अर्पित करना पूरे जगत की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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नीम-मिश्री का दिव्य भोग
स्नान के बाद भगवान को नीम की कोमल पत्तियों और मिश्री के शरबत का भोग लगाया जाता है।

धार्मिक अर्थ: यह जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को समान भाव से स्वीकार करने का प्रतीक है।

वैज्ञानिक अर्थ: खाली पेट नीम और मिश्री का सेवन खून साफ करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने में सहायक होता है।

नववर्ष का दिव्य स्वागत
हिंदू नववर्ष के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त में भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का विशेष अभिषेक होता है। इसके साथ ही मंदिर के शिखर पर नया ध्वज भी फहराया जाता है, जो नई ऊर्जा और संकल्प का प्रतीक है।

इस दिन मंदिर में होने वाली मुख्य रस्में
सूर्य अर्घ्य: पुजारी कोटितीर्थ कुंड के तट पर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर नए साल का स्वागत करते हैं।

पंचांग पूजन: भगवान चंद्रमौलेश्वर के सामने नए साल के पंचांग का पूजन किया जाता है और आने वाले वर्ष के भविष्यफल का श्रवण होता है।

नीम प्रसादी: दर्शन के बाद भक्तों को नीम और मिश्री का प्रसाद दिया जाता है, ताकि वे वर्षभर स्वस्थ रहें।

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Content Editor

Sarita Thapa

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