Thiruparankundram Murugan Temple : चट्टानों को काटकर बना 6वीं सदी का थिरुपरनकुंड्रम मुरुगन मंदिर, जानें इसका इतिहास और मान्यताएं
punjabkesari.in Saturday, May 02, 2026 - 03:02 PM (IST)
Thiruparankundram Murugan Temple : तमिलनाडु में मदुरै के पास थिरुपरनकुंड्रम में मुरुगन मंदिर का इतिहास पौराणिक कथाओं और स्थानीय लोककथाओं से भरा है, जो इसे श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों, दोनों के लिए एक आकर्षक स्थल बनाता है। जो लोग साऊथ से नहीं हैं उनके मन में यह सवाल आना लाजमी है कि आखिर भगवान मुरुगन कौन हैं? भगवान मुरुगन, जिन्हें कार्तिकेय या स्कंद के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र और भगवान गणेश के भाई हैं। उन्हें ज्ञान, साहस और विजय का प्रतीक माना जाता है।

मंदिर की विशेषता
मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार यहीं पर भगवान मुरुगन और इंद्र की बेटी देवसेना का विवाह हुआ था जिसके बाद मंदिर को विवाह और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए अत्यंत शुभ माना जाने लगा। कहते हैं कि इस मंदिर में सच्चे मन से एक दीपक जलाने वाले श्रद्धालु का विवाह मनचाहे व्यक्ति से हो जाता है और यहां विवाह करने वाले जोड़ों को सुखी तथा सफल वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
मंदिर की सुंदर वास्तुकला
यह महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है, जिसे भगवान मुरुगन के 6 पवित्र निवासों (अरुपदाई वीदु) में से पहला माना जाता है। यह छठी शताब्दी का ‘रॉक-कट’ मंदिर है यानी इसे पहाड़ी के बीच चट्टानों को काट कर बनाया गया है।पांड्या राजाओं द्वारा बनाए इस मंदिर में अद्वितीय वास्तुकला और एक पहाड़ी के ऊपर स्थित होने की विशेषता है। यहां आने वाले भक्तों को भगवान शिव और विष्णु की मूर्तियां एक ही स्थान पर देखने को भी मिलती हैं।

दर्शन का समय तथा उत्सव
मंदिर में सुबह 5 बजे से दोपहर 1 बजे तक और शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। यहां मार्च-अप्रैल में 14 दिनों का उत्सव मनाया जाता है, जिसमें भगवान मुरुगन की विजय और देवसेना से उनके विवाह का उत्सव होता है।
कैसे पहुंचें
मंदिर मदुरै शहर से लगभग 8-10 किलोमीटर दूर है। जहां मदुरै हवाई अड्डे (9 किमी) और थिरुपरनकुंद्रम रेलवे स्टेशन (1.5 किमी) से आसानी से पहुंचा जा सकता है। आप मदुरै से बस या टैक्सी ले सकते हैं। मदुरै से यहां के लिए नियमित बसें चलती हैं, और टैक्सी से 10-15 मिनट ही लगते हैं।
हालिया विवाद
मंदिर के पीछे की पहाड़ी पर एक दरगाह है। पहाड़ी पर मौजूद एक स्तंभ पर दीपक जलाने से जुड़ा विवाद इन दिनों चर्चा में है। इसकी इजाजत देने वाले जज के खिलाफ महाभियोग के लिए विपक्षी सांसदों ने प्रस्ताव दिया है। मंदिर और दरगाह में 3 किलोमीटर की दूरी है लेकिन हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच पहाड़ी पर अधिकार को लेकर तनाव रहा है। मंदिर और दरगाह ने 1920 में पहली बार पहाड़ी पर कानूनी अधिकार को लेकर चुनौती दी थी। सिविल कोर्ट ने फैसला दिया था जहां दरगाह बनी है, उसको छोड़कर बाकी पहाड़ी मंदिर (देवस्थानम) की है। इस फैसले ने पहाड़ी के स्वामित्व का निपटारा तो कर दिया, लेकिन इसमें रीति-रिवाजों, पर पराओं या दीपम की पर परा का उल्लेख नहीं किया गया था। हालांकि, मंदिर पक्ष का दावा है कि 100 साल पहले तक पहाड़ी पर मौजूद स्त भ पर ही दीपक जलाया जाता था।
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