Srimad Bhagavad Gita: सीखिए ‘तटस्थ’ रहना

punjabkesari.in Friday, Oct 07, 2022 - 09:20 AM (IST)

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Srimad Bhagavad Gita: हम अपने कार्यों और निर्णयों के साथ-साथ दूसरों के कार्यों को भी अच्छा या बुरा कहने के आदी हो चुके हैं। श्री कृष्ण कहते हैं कि समबुद्धि युक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है, जिसका अर्थ है कि एक बार जब हम समत्व योग को प्राप्त कर लेते हैं तो अच्छा-बुरा कहने की आदत चली जाती है।हमारा दिमाग जैसे एक रंग-बिरंगे चश्मे से ढंका हो। यह चश्मा हमारे माता-पिता, परिवार और दोस्तों द्वारा हमारे प्रारंभिक वर्षों के दौरान और साथ ही देश के कानून द्वारा तय नियमों जैसा है। 

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हम इसी चश्मे के माध्यम से चीजों/कर्मों को देखते और उन्हें अच्छा या बुरा मान लेते हैं। योग में, इस चश्मे का रंग उतर जाता है, जिससे चीजें साफ दिखने लगती हैं, जो टहनियों के बजाय जड़ों को नष्ट करने और चीजों को जैसे है, वैसे ही स्वीकार करने के समान है।

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मध्य मार्ग उस चर्चा की तरह है, जहां एक छात्र को एक साथ किसी मुद्दे के पक्ष में और उसके विरुद्ध में बहस करनी होती है। 
यह कानून की तरह भी है, जहां हम निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों की बात सुनते हैं। यह सभी प्राणियों में स्वयं और सभी प्राणियों को स्वयं में देखने जैसा है और अंत में हर जगह श्री कृष्ण को देखने जैसा है।

यह खुद को स्थिति से जल्दी से अलग करने और कहानी के दोनों पक्षों की सराहना करने की क्षमता है। जब यह क्षमता विकसित हो जाती है, तो हम अपने-आप को हालात के मध्य में केंद्रित करने लगते हैं।

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जब कोई थोड़ी देर के लिए समत्व का योग प्राप्त कर लेता है, तो उनमें से जो भी कर्म निकलता है, वह सामंजस्यपूर्ण होता है। आध्यात्मिकता को सांख्यिकीय कोण से देखें तो यह समय का वह प्रतिशत है, जब हम संतुलन में रहते हैं और जीवन की यात्रा इसे 100 प्रतिशत तक बढ़ाने के बारे में है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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