Shani Pradosh Vrat Katha: शनि प्रदोष कथा और मंत्र, जिनसे प्रसन्न होते हैं नीलकंठ और कट जाते हैं साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्ट

punjabkesari.in Friday, Jun 26, 2026 - 03:38 PM (IST)

Shani Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत को सर्वोत्तम माना गया है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 27 जून को पड़ रही है। इस बार यह व्रत शनिवार के दिन होने के कारण 'शनि प्रदोष व्रत' का एक अत्यंत शुभ संयोग बना रहा है। मान्यता है कि शनि प्रदोष के दिन महादेव के साथ-साथ शनि देव की विधि-विधान से पूजा करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या के अशुभ प्रभावों में कमी आती है।

27 जून को दूसरा और 2026 का आखिरी शनि प्रदोष व्रत है, जो जातक व्रत करने में सक्षम नहीं हैं तो वे शनि प्रदोष व्रत कथा अवश्य पढ़ें और भगवान शिव पर देसी घी का दीपक और शनि देव पर सरसों के तेल का दीपक अर्पित करें। इससे भी अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है और भगवान शिव व शनि देव की कृपा  भी प्राप्त होती है। 

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Shani Pradosh Vrat Katha शनि प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफ़ी दुखी थे। दुःख का कारण था उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों संताप से घुले जा रहे थे।

एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पड़े। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नहीं टूटी मगर पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे।

अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे। सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले, ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की व्यथा भांप गया हूं वत्स ! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’ 

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साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई। 
 
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार।
शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥ 
हे नीलकंठ सुर नमस्कार। 
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥
हे उमाकान्त सुधि नमस्कार।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार।
विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥ 
 

तीर्थ यात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया। शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया। दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे।

शनि प्रदोष व्रत से संबंधित विशेष जानकारी: स्रोतों के अनुसार, यह 2026 का दूसरा और आखिरी शनि प्रदोष व्रत है।  यदि आप व्रत नहीं रख सकते, तो शनि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करना और भगवान शिव पर देसी घी व शनि देव पर सरसों के तेल का दीपक अर्पित करना भी समान रूप से फलदायी माना गया है।

हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत को सर्वोत्तम माना गया है। लेकिन जब यह व्रत शनिवार के दिन पड़ता है, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 27 जून को पड़ रही है, जो शनिवार होने के कारण 'शनि प्रदोष व्रत' का एक अत्यंत शुभ संयोग बना रही है।  यह न केवल महादेव को प्रसन्न करने का दिन है, बल्कि शनि देव की साढ़ेसाती और ढैय्या के अशुभ प्रभावों को कम करने का भी एक दुर्लभ अवसर है।  जो जातक जीवन में संतान सुख, धन-वैभव और मानसिक शांति की राह देख रहे हैं, उनके लिए यह दिन किसी वरदान से कम नहीं है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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