Sarva Pitru Amavasya 2026: 10 अक्टूबर को विदा होंगे पितर, भूल-चूक की माफी और पूरे पितृपक्ष का फल पाने के लिए जरूर करें यह काम
punjabkesari.in Wednesday, Oct 07, 2026 - 12:32 PM (IST)
Sarva Pitru Amavasya 2026: सनातन धर्म में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि यानी सर्वपितृ अमावस्या का अत्यंत विशेष और कल्याणकारी स्थान है। साल 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी। यह दिन 16 दिनों के पितृपक्ष का अंतिम अवसर होता है, जिसमें सभी पूर्वजों का ध्यान कर उनका तर्पण और पिंडदान किया जाता है। शास्त्रों में इस पावन तिथि को अत्यंत मुक्तिदायी माना गया है।

हमारे पितृ प्रसन्न होंगे, तभी हम समृद्ध होंगे, हमारा अस्तित्व पूर्वजों के कारण है। प्रति वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिप्रदा से अमावस्या तक महालय यानी पितृपक्ष के श्राद्ध निर्धारित रहते हैं। प्रोष्ठपदी पूर्णिमा से ही श्राद्ध प्रारंभ हो जाते हैं। गीता में 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है, जबकि पितरों का आयु 1000 वर्ष मानी गई है। हमारे वेदों एवं शास्त्रों में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि जो प्राणी अपने पितरों को प्रसन्न रखने के लिए तथा शांति के लिए कर्म नहीं करता, वह नाना प्रकार के कष्टों, ऋण, रोग, शोक, संतान कष्ट, राज कष्ट और भूमि कष्ट से पीड़ित होता है। अगर हमारे पूर्वज न होते तो हमारा अस्तित्व न होता। जब हमारे पितृ ही रुष्ठ होंगे तो हमारे देवता भी हमारे समीप नहीं आ सकते। मृतक का श्राद्ध करने वाले परिवार को स्वर्ग लोक, विष्णु लोक और ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है। पितृ पक्ष के इन 16 दिनों में यदि आप घर से बाहर हैं, तो फल, मिष्ठान का दान कर सकते हैं। अगर आप दक्षिण की तरफ मुंह करके अपने पितरों को याद कर आंसू बहा देंगे, तो भी पितृ तृप्त हो जाएंगे।

श्राद्ध के 5 मुख्य कर्म अवश्य करने चाहिए।
तर्पण: दूध, तिल, कुशा, पुष्प, सुगंधित जल पित्तरों को नित्य अर्पित करें।
पिंडदान : चावल या जौ के पिंडदान, करके भूखों को भोजन दें।
वस्त्रदान: निर्धनों को वस्त्र दें।
दक्षिणा : भोजन के बाद दक्षिणा दिए बिना एवं चरण स्पर्श बिना फल नहीं मिलता।
पूर्वजों के नाम पर, कोई भी सामाजिक कृत्य जैसे -शिक्षा दान, रक्तदान, भोजन दान, वृक्षारोपण, चिकित्सा संबंधी दान आदि अवश्य करना चाहिए।
Pitru Paksha Shraddha किस तिथि को किसका करें श्राद्ध?
जिस तिथि को जिसका निधन हुआ हो उसी दिन श्राद्ध किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु प्रतिपदा को हुई है तो उसी तिथि के दिन श्रद्धा से याद किया जाना चाहिए। यदि देहावसान की डेट नहीं मालूम तो फिर भी कुछ सरल नियम बनाए गए हैं। पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का नवमी पर किया जाना चाहिए। जिनकी मृत्यु दुर्घटना, आत्मघात या अचानक हुई हो, उनका चतुदर्शी का दिन नियत है। साधु- सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी पर होगा। जिनके बारे कुछ मालूम नहीं, उनका श्राद्ध अंतिम दिन अमावस पर किया जाता है जिसे सर्वपितृ श्राद्ध कहते हैं।

कौन-कौन कर सकता है श्राद्ध कर्म?
पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में संपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए। एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है। पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं। पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं।
पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है। पत्नी का श्राद्ध व्यक्ति तभी कर सकता है, जब कोई पुत्र न हो। पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी श्राद्ध कर सकता है।
गोद लिया पुत्र भी श्राद्ध का अधिकारी माना गया है।
पितृपक्ष के पखवाड़े में स्त्री एवं पुरुष दोनों को ही सदाचार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
यह एक शोक पर्व होता है जिसमें धन प्रदर्शन, सौंदर्य प्रदर्शन से बचना चाहिए। फिर भी यह पक्ष श्रद्धा एवं आस्था से जुड़ा है। जिस परिवार में त्रासदी हो गई हो वहां स्मरण पक्ष में स्वयं ही विलासिता का मन नहीं करता। अधिकांश लोग पितृपक्ष में शेव आदि नहीं करते अर्थात एक साधारण व्यवस्था में रहते हैं।
श्राद्ध पक्ष में पत्तलों का प्रयोग करना चाहिए। इससे वातावरण एवं पर्यावरण भी दूषित नहीं होता।
इस दौरान घर आए अतिथि या भिखारी को भोजन या पानी दिए बिना नहीं जाने देना चाहिए। पता नहीं किस रूप में कोई किसी पूर्वज की आत्मा आपके द्वार आ जाएं।

पूरे पितृपक्ष का पुण्य पाने का एकमात्र अवसर
जीवन की भागदौड़ या किसी अनिवार्य परिस्थिति के कारण जो लोग पूरे 16 दिनों तक नियमपूर्वक तर्पण नहीं कर पाते, उनके लिए यह सर्वपितृ अमावस्या तिथि वरदान समान है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन केवल एक बार पूरी निष्ठा से किया गया तर्पण और पिंडदान पूरे पितृपक्ष के श्राद्ध का फल प्रदान करता है। इससे जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
पंचबलि का विशेष नियम और सही तरीका
सर्वपितृ अमावस्या के दिन घर में सात्विक भोजन तैयार होने के बाद भोजन ग्रहण करने से पूर्व सबसे पहले पांच मुख्य भागों में अन्न निकाला जाता है, जिसे शास्त्रों में पंचबलि कहा गया है। इन 5 जीवों को अर्पित किया जाता है पंचबलि भोग: देव (देवता), गाय, कुत्ता, कौआ और चींटी। पंचबलि का धार्मिक महत्व: मान्यता के अनुसार, इन जीवों के माध्यम से अर्पित किया गया अन्न सीधे पितरों तक पहुंचता है और वे पूर्ण रूप से तृप्त हो जाते हैं। श्रद्धापूर्वक पंचबलि निकालने से पितृ दोष शांत होते हैं और घर-परिवार पर पितरों की कृपा सदैव बनी रहती है।
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Content Writer
Niyati Bhandari