Sant Kabir Jayanti 2026: कबीर जी की शिक्षाओं में छिपा है हर समस्या का समाधान
punjabkesari.in Saturday, Jun 27, 2026 - 03:09 PM (IST)
Sant Kabir Jayanti 2026: भक्तिकाल की संत परम्परा में संत शिरोमणि सद्गुरु कबीर जी का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने समाज के सामने धर्म का वह व्यावहारिक पक्ष रखा जो कर्मकांडों से ऊपर उठकर सीधे आत्मा से जुड़ा है। कबीर जी का मानना था कि जीव और ईश्वर एक ही हैं, लेकिन मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण उस परमात्मा को बाहर ढूंढता फिरता है, जबकि वह उसके हृदय के भीतर ही निवास करता है।

अहंकार: भक्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा
सद्गुरु कबीर के अनुसार, हम जिस ईश्वर की तलाश में दर-दर भटकते हैं, उसे देखने में केवल एक ही बाधा है हमारा 'अहंकार'। उन्होंने बहुत सहज शब्दों में समझाया है कि यदि हम अहंकार का त्याग कर शरणागत भाव से भक्ति करें, तो अपने भीतर छिपे परमात्मा को पहचान सकते हैं।
कबीर जी कहते हैं कि भक्ति का यह मार्ग कोई 'मौसी का घर' नहीं है जहां जब चाहे अधिकार के साथ प्रवेश कर लिया जाए। इसके लिए स्वयं को समर्पित करना पड़ता है। उनके शब्दों में: "प्रेम न बारी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय। राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय।।"
अर्थात्, प्रेम और भक्ति कोई ऐसी वस्तु नहीं जो बाग में उगे या बाजार में बिके; इसे वही प्राप्त कर सकता है जो अपना अहंकार (शीश) त्यागने को तैयार हो।

सच्चा ज्ञानी कौन?
दुनिया में लोग बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर खुद को विद्वान मानते हैं, लेकिन कबीर जी की दृष्टि में वे ज्ञानी नहीं हैं। उनके अनुसार, जिसने प्रेम के महत्व को नहीं समझा, उसकी सारी पढ़ाई व्यर्थ है।
"पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोय। एकै आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।।"
सुख में सुमिरन: दुखों से बचने का अचूक मंत्र
अक्सर देखा जाता है कि लोग केवल दुख की घड़ी में ही भगवान को याद करते हैं। सद्गुरु कबीर जी ने इस मानवीय स्वभाव पर गहरा प्रहार करते हुए कहा है कि यदि मनुष्य सुख के समय भी परमात्मा का ध्यान रखे, तो जीवन में दुख का आगमन ही नहीं होगा।
"दु:ख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय। जो सुख में सुमिरन करै, फिर दु:ख काहे होय।।"
दिखावे से दूर, मन का सुमिरन
सच्ची भक्ति प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। कबीर जी बाहरी आडम्बरों और दिखावे के राम-नाम के सख्त खिलाफ थे। उनका संदेश था कि बाहर के दरवाजे बंद कर अपने भीतर के पट खोलो और मौन रहकर परमात्मा का ध्यान करो।
"सुमिरौ सुरत लगाय के, मुख से कुछ न बोल। बाहर का पट बंद कर, अंदर का पट खोल।।"
सद्गुरु कबीर जी की शिक्षाएं आज के समय में और भी प्रासंगिक हैं। यदि हम जातिवाद, छुआछूत और सांप्रदायिकता जैसी सामाजिक बुराइयों से ऊपर उठकर परस्पर प्रेम की भावना अपनाएं, तो एक समरस और सुखी समाज की स्थापना की जा सकती है।

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