Ramayan Katha: सबसे बड़ा शिव भक्त होने के बावजूद रावण सीता स्वयंवर में क्यों नहीं उठा पाया था महादेव का धनुष? जानिए असली कारण
punjabkesari.in Wednesday, Jan 14, 2026 - 12:25 PM (IST)
Ramayan Katha: लंका का राजा रावण केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि वेदों और शास्त्रों का महान ज्ञाता भी था। उसे त्रिलोक विजेता कहा जाता था और भगवान शिव का उससे बड़ा भक्त शायद ही कोई रहा हो। उसने अपने दस शीश काटकर महादेव को अर्पित किए थे और शिव व ब्रह्मा की घोर तपस्या से अनेक वरदान प्राप्त किए थे। फिर भी एक प्रश्न सदियों से लोगों के मन में है सीता स्वयंवर में रावण महादेव का धनुष क्यों नहीं उठा पाया?

सीता स्वयंवर और शिव धनुष की शर्त
वाल्मीकि रामायण के बालकांड में सीता स्वयंवर का विस्तार से वर्णन मिलता है। राजा जनक ने माता सीता के विवाह के लिए एक अत्यंत कठिन शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि जो भी वीर भगवान शिव के दिव्य धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, वही सीता का योग्य वर होगा। इस स्वयंवर में अनेक शक्तिशाली राजा और राजकुमार आए। इन्हीं में लंका नरेश दशानन रावण भी शामिल था।

सबसे बड़ा शिव भक्त, फिर भी असफल क्यों हुआ रावण?
रामायण के अनुसार, रावण ने अपने बाहुबल के दम पर कैलाश पर्वत तक उठा लिया था, लेकिन शिव धनुष को उठाने में वह असफल रहा। शास्त्रों में इसका कारण केवल शारीरिक बल की कमी नहीं बताया गया है। महादेव के धनुष को उठाने के लिए तीन गुण आवश्यक थे शुद्ध भक्ति, प्रेम, विनम्रता और उदारता रावण के पास अपार बल और तपस्या थी, लेकिन उसमें अहंकार और आसक्ति भी थी। वह शक्ति से सब कुछ जीतना चाहता था, जबकि शिव धनुष केवल वही उठा सकता था, जिसके हृदय में अहंकार का लेश मात्र भी न हो।

श्रीराम ने कैसे उठाया शिव धनुष?
जब सभी राजा असफल हो गए, तब प्रभु श्रीराम को धनुष उठाने के लिए आमंत्रित किया गया। श्रीराम ने सबसे पहले धनुष को प्रणाम किया, फिर सहज भाव से उसे उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह धनुष टूट गया।
यह घटना यह दर्शाती है कि जहां रावण का बल अहंकार से भरा था, वहीं राम का बल धर्म और भक्ति से युक्त था।

शिव धनुष का नाम और उसका महत्व
शास्त्रों के अनुसार, महादेव के इस धनुष का नाम पिनाक था। इसी धनुष से भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था और उसकी तीनों नगरी को एक ही बाण से भस्म कर दिया था। बाद में यह धनुष देवताओं के माध्यम से राजा जनक तक पहुंचा।

कथा से मिलने वाली शिक्षा
यह कथा सिखाती है कि केवल शक्ति नहीं, संस्कार और विनम्रता भी आवश्यक है। अहंकार सबसे बड़े भक्त को भी गिरा सकता है। धर्म और मर्यादा से युक्त व्यक्ति ही सच्चा विजेता होता है।

