भारत ही नहीं, दुनिया भर में पुरखों की याद में निभाई जाती हैं अनोखी परंपराएं, जानें कहां कैसे होता है श्राद्ध

punjabkesari.in Sunday, Sep 27, 2026 - 10:17 AM (IST)

Pitru Paksha Traditions Worldwide : जापान, अगस्त के बीच की एक उमस भरी शाम। दरवाजे के पास एक खीरा रखा है, जिसे चार सीकें खोंसकर घोड़ा बना दिया गया है। बगल में चार टांगों वाला बैंगन है, जिसे गाय कहते हैं। ये ओबोन के दिन हैं (अधिकतर जापान में 13 से 16 अगस्त, टोक्यो में जुलाई), जब माना जाता है कि पुरखे घर लौटते हैं। तेज घोड़ा उन्हें जल्दी लाता है, धीमी गाय विदाई में देर कराती है। कहानी मीठी है, पर पीछे एक सवाल छोड़ जाती है: पुरखों की सवारी खीरे और बैंगन की ही क्यों?

Pitru Paksha Traditions Worldwide

यही सवाल अब अपने घर ले आइए। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितम्बर (भाद्रपद पूर्णिमा) से 10 अक्तूबर (सर्वपितृ अमावस्या) तक है। कनागत में उत्तर भारत के बहुत से घरों में खीर-पूरी और कहू की सब्जी बनेगी। और इस सप्ताह यह सवाल और दिलचस्प हो जाता है। कोरिया का छुसोक 25 सितम्बर को है, और जापान का शरद-हिगान 26 सितम्बर को पूरा होता है, ठीक जिस दिन हमारा पितृपक्ष शुरू होता है। तीन सभ्यताएं कुछ ही दिनों के अंतर पर अपने पुरखों के लिए थाली सजा रही हैं। क्या इन थालियों को सिर्फ श्रद्धा ने सजाया, या इनमें ऋतु का भी हाथ है? उत्तर ‘हां’ भी है और ‘नहीं’ भी। और असली कहानी ‘नहीं’ वाले हिस्से में छिपी है।

पिंड और थाली एक चीज नहीं
पितृपक्ष वर्षा के उतार और शरद की दहलीज पर पड़ता है। आयुर्वेद की ऋतुचर्या कहती है कि बरसात में जठराग्नि मंद पड़ जाती है और पित्त भीतर जमा होने लगता है। फिर शरद की तीखी, साफ धूप में यही संचित पित्त भड़क उठता है। इसलिए शरद में हल्का, शीतल, मधुर और तिक्त रस वाला भोजन बताया गया है। मूंग का नाम तो विशेष रूप से आता है।
इस कसौटी पर सादा चावल, मूंग की दाल और कद्दू आसानी से खरे उतरते हैं। खीर भी, पर एक शर्त के साथ। दूध, चावल, शक्कर और घी की खीर मधुर और पित्त-शामक मानी जा सकती है, पर वह गुरु यानी भारी भी है। बरसात से उबरती कमजोर अग्नि पर कटोरा भर गाढ़ी खीर उल्टा असर कर सकती है। ताजी हो, थोड़ी हो और भूख लगी हो, तभी खीर इस ऋतु की मित्र है। उसे ‘डिटॉक्स’ या एसिडिटी का इलाज बताना परम्परा का सम्मान नहीं, उसका विज्ञापन है।

Pitru Paksha Traditions Worldwide

तिल की पहेली
अब असली मोड़। पितृकर्म में सबसे अनिवार्य पदार्थ कौन-सा है? तिल। पर आयुर्वेद में तिल स्निग्ध और उष्ण है, यानी पित्त वाली ऋतु के लिए सबसे अटपटा चुनाव। तली हुई पूरी और उड़द की भारी तैयारी भी शरद में हल्के भोजन की सलाह से मेल नहीं खातीं। तो क्या तर्क ढह गया? नहीं, बात यहीं से दिलचस्प होती है। पितरों की थाली पर ऋतु अकेली नहीं बैठी; उसके साथ प्रतीक भी है और मेहमाननवाजी भी। आयुर्वेद इस थाली का एक हिस्सा समझाता है, पूरी थाली नहीं। जो हर व्यंजन को दवा साबित करना चाहता है, वह परम्परा को बड़ा नहीं, छोटा करता है।

चीन: हरे गोले का असली राज
छगमिंग 4 या 5 अप्रैल को पड़ता है (इस वर्ष 5 अप्रैल)। यह चीन का समाधि-सफाई का पर्व है और चौबीस सौर-अवधियों में पांचवीं भी। शंघाई के आसपास के जियांगनान इलाके में इसकी पहचान है ङ्क्षछगतुआन: चिपचिपे चावल का हरा गोला, जिसका रंग-सुगंध वसंत की कोमल पत्तियों के रस से आता है, अक्सर चीनी मगवर्ट से। आजकल इसे एक नारे से बेचा जाता है: ‘वसंत यानी लिवर, इसलिए हरा खाओ और लिवर साफ करो।’ पर चीनी चिकित्सा की अपनी किताबें कुछ और कहती हैं। उनमें चिपचिपा चावल मधुर और उष्ण है, पेट और प्लीहा को सहारा देने वाला, और मगवर्ट तीखी, कड़वी और गर्म, ठंड को छांटने वाली। और जियांगनान का छगमिंग अक्सर ठंडा-नम होता है। यानी ङ्क्षछगतुआन सफाई का नहीं, ठंडी-गीली वसंत से जूझने का भोजन ज्यादा है। हांगकांग के चीनी-चिकित्सा स्रोत यह भी चेताते हैं कि ज्यादा चिपचिपा चावल पेट में ठहर जाता है।

जापान: पहेली का जवाब
अब लौटते हैं उसी खीरे के घोड़े पर। जापान में उमस भरी गर्मी होती है। भाप में पका बैंगन शरीर को ठंडा रखता है। नारा में बैंगन, कद्दू, बीन्स और अरबी के डंठल समेत सात मौसमी सब्जियां तिल-मिसो में मिलाकर चढ़ाई जाती हैं। तो खीरा और बैंगन इसलिए नहीं चुने गए कि उनमें सींकें आसानी से घुस जाती हैं। वे उस मौसम की सबसे भरपूर, पानी से भरी और ठंडक देने वाली मानी गई उपज हैं। इन छह परंपराओं में ऋतु और पितृ-भोजन का सबसे गहरा मेल यहीं है। पर घोड़ा पुरखों को ठंडक नहीं पहुंचाता; प्रतीक और गुण अलग बातें हैं।

Pitru Paksha Traditions Worldwide

कोरिया: फसल की दावत
छुसोक आठवें चांद्र मास की पूर्णिमा को पड़ता है। यह पुरखों को धन्यवाद का दिन भी है और फसल का उत्सव भी। इसकी पहचान सोंगप्योन है : चावल के आटे के छोटे पकवान, जिनमें तिल, बीन्स, चेस्टनट या सूखे जुजुब (बेर की जाति का फल) भरे जाते हैं और जो चीड़ की सुइयों पर भाप में पकते हैं। कोरियाई विद्वानों ने अपने चिकित्सा-ग्रंथों से शरद का भोजन पढ़ा है : सूखी हवा, दिन-रात के तापमान का बड़ा अंतर और फेफड़ों की रक्षा के लिए मूली, नाशपाती, अरबी जैसे ‘सफेद’ भोजन की परम्परा। फिर भी छुसोक की मेज पहले एक फसल दावत ही है।

मैक्सिको: मक्के का अपना विज्ञान
एशिया से बाहर एक सावधानी जरूरी है। मैक्सिको का दिया दे लोस मुएर्तोस 1 और 2 नवम्बर को, मक्के के फसल-चक्र के समापन के आसपास पड़ता है। वेदियों पर दिवंगत की पसंद के व्यंजन, मक्के से बनी चीजें और पान दे मुएर्तो, यानी ‘मृतकों की रोटी’, सजती है। यहां पित्त या प्लीहा की भाषा थोपना बेईमानी होगी। मक्के को चूने के पानी में पकाने की प्राचीन विधि ‘निक्सटामलाइजेशन’ उसके पोषक तत्वों को शरीर के लिए कहीं अधिक सुलभ बना देती है।

Pitru Paksha Traditions Worldwide

रोम: सबसे सादी थाली
प्राचीन रोम का पेरेंटालिया 13 से 21 फरवरी तक चलता था, जब सर्दी ढलान पर होती थी और भंडार खाली होने लगते थे। परिवार की कब्रों पर थोड़ा अनाज, रोटी, नमक और शराब रखी जाती थी। यहां मौसम अभाव के रूप में बोलता है : जब अन्न गिना-चुना हो, तो श्रद्धा भी सादगी में ही व्यक्त होती है।

थाली का पंचांग
छहों कहानियां जोड़ें तो हमारे पूर्वज किसी प्रयोगशाला में पितृ-भोजन रचते नहीं दिखते। वे उसी मौसम की उपज परोसते थे जिसमें पुरखों को याद करते थे, और उनकी चिकित्सा पद्धतियां भी उसी मौसम, उसी मिट्टी में पली थीं। इसलिए कहीं थाली और ऋतुचर्या एक-दूसरे को पूरी तरह पहचान लेती हैं, जैसे ओबोन में। कहीं आधी-अधूरी, जैसे हमारे पितृपक्ष में। और रोम में ऋतु सिर्फ खाली होते भंडार से झांकती है। अगली बार जब श्राद्ध की खीर का कटोरा सामने आए, तो उसे दवा का प्रमाणपत्र मत दीजिए, और अंधविश्वास कहकर खारिज भी मत कीजिए। उसे एक पंचांग की तरह पढि़ए। शायद इसीलिए पुरखे हर साल ठीक उसी मौसम में लौटते हैं, जब खेत उन्हें परोसने लायक कुछ दे चुके होते हैं।

Pitru Paksha Traditions Worldwide


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Sarita Thapa

Related News