झांसी में श्रीराम कथा के दौरान मोरारी बापू ने सुनाया राम जन्म का प्रसंग, बताया स्वस्तिक का खास महत्व
punjabkesari.in Friday, Oct 16, 2026 - 06:39 PM (IST)
Morari Bapu Jhansi Ram Katha(परविंदर कुमार मिश्रा) : भारत स्वस्तिक यात्रा के सातवें दिन आज यात्रा झांसी पहुंची। यहां सबसे पहले पूज्य मोरारी बापू झांसी की रानी के किले में पहुंचे और किले का भ्रमण किया। इसके बाद वह श्रीराम कथा में पहुंचे। नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी को प्रणाम किया और झांसी की रानी को भी नमन किया। कथा के दौरान पूज्य मोरारी बापू ने स्वस्तिक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वस्तिक सदैव मंगलकारी होता है। इसमें चार मार्ग होते हैं, जैसे साधु मार्ग, महादेव मार्ग और गुरु मार्ग आदि। मार्ग कितना भी अच्छा क्यों न हो, लेकिन व्यक्ति को सत्य का साधक होना चाहिए। दिव्य मार्ग तीन प्रकार के होते हैं। उन्होंने कहा कि सत्य के मार्ग पर चलते रहना चाहिए। इसका फल आज नहीं तो कल, नहीं तो परसों या अगले जन्म में भी मिल सकता है। जो साधक सत्य का मार्ग अपनाता है, उससे पंथ भी गदगद हो जाता है। भगवान राम भी सत्य के मार्ग पर चले थे। सत्य के रास्ते पर चलने से मार्ग भी दिव्य हो जाता है। मीरा जहां चलीं, वह मार्ग दिव्य हो गया और भरत जी जब चित्रकूट गए तो वह मार्ग भी दिव्य हो गया। भरत जी के गुण देखकर त्रिवेणी ने उन्हें साधु कहा। मानस के इस मार्ग पर प्रेमी ही आ सकता है, पंडित नहीं, जबकि विद्वान कुछ हद तक इस मार्ग पर आ सकते हैं। मीरा तो इस मार्ग पर दौड़कर आएंगी।
बापू ने शरीर के बारे में बताते हुए कहा कि शरीर स्थूल और सूक्ष्म आदि प्रकार का होता है। यदि शरीर को भोजन न मिले तो वह कमजोर पड़ जाता है। अंदरूनी शरीर को वायु की जरूरत होती है, लेकिन आत्मा को प्रसन्नता किसी महापुरुष की वाणी से मिलती है। भगवान राम ने जहां बाण से काम लेना था, वहां बाण का प्रयोग किया और जहां वाणी से काम लेना था, वहां वाणी का प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि देवताओं ने उनका कुछ नहीं बिगाड़ा, लेकिन जब श्रीराम जी से भरत जी मिलने जा रहे थे, तब बृहस्पति ने विघ्न डाला। ऐसे में उन्हें दिव्य कैसे कहा जाए? गुरु के पास संपत्ति लेकर नहीं, बल्कि समिधा लेकर जाना चाहिए। लकड़ी बनकर भक्ति के हवन में समर्पित होना चाहिए। पितृ मार्ग, चतु्ष्पद में सूर्य का मार्ग मित्रता का मार्ग है, जो अग्नि और प्रकाश से जुड़ा है। पुराणों में पहला मंत्र या पहले दो शब्द अग्नि से लिए गए हैं। हर बार यही होता है कि किसी ने किसी को दिया और उससे लिया। इसलिए सबसे पहले अपने आप को समर्पित करना चाहिए, फिर सामने से भी प्राप्त होता है। केवट ने भगवान को नदी पार कराई और बदले में भगवान को प्राप्त कर लिया।
बापू ने श्रद्धा का महत्व बताते हुए कहा कि सबसे पहले श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा से रहित व्यक्ति गुरु का नहीं हो सकता। कहा जाता है कि श्रद्धा से ज्ञान की प्राप्ति होती है और विश्वास से भक्ति की। जब भरोसा आ जाता है तो अंधे को भी मार्ग दिखाई देने लगता है, जैसे सूरदास जी को। उन्होंने पितृ पक्ष, गुरु पक्ष, देव पक्ष और भक्ति पक्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि ये चारों पक्ष हैं और बीच में ब्रह्मा हैं। वही ब्रह्मा राम हैं। चाहे उन्हें राम कहें, कृष्ण कहें या गणेश, सभी एक ही केंद्र बिंदु और मूल ब्रह्म से जुड़े हैं। बापू ने परिवार और रिश्तों के महत्व पर भी बात की। उन्होंने कहा कि एक समय रघुकुल में पति-पत्नी एक-दूसरे के साधन नहीं, बल्कि साध्य थे। आजकल की पीढ़ी शादी नहीं करना चाहती। हम बहुत से ऐसे परिवार देखते हैं, जहां माता-पिता के ठीक से न रहने का असर बच्चों पर भी पड़ता है। यदि राम जैसी संतान चाहिए तो बच्चों को आदर, सत्कार और प्यार देना चाहिए।
आज श्रीराम कथा में भगवान राम के प्राकट्य का प्रसंग सुनाया गया। बापू ने भजन की शक्ति बताते हुए कहा कि भजन के प्रभाव से व्यक्ति कर्मों के बंधन से मुक्त हो सकता है, वरना कर्मों का प्रभाव ब्रह्मा के पिता को भी भोगना पड़ता है। जब राजा दशरथ को संतान नहीं हुई तो उन्हें ग्लानि हुई और वह अपने गुरु के पास गए। गुरु ने कहा कि आप एक संतान को लेकर चिंतित हैं, लेकिन आपको चार पुत्र प्राप्त होंगे। भगवान मध्य समय में प्रकट हुए और स्वस्तिक भी मध्य में होता है। यह प्रसंग चैत्र मास में भगवान राम के प्राकट्य और स्वस्तिक के महत्व से जुड़ा हुआ है।
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