गणेश जी का स्वरूप सिखाता है जीवन के बड़े सबक, जानें हर अंग का खास महत्व
punjabkesari.in Sunday, Sep 13, 2026 - 02:58 PM (IST)
Meaning Of Ganesha Body Parts : भारतीय संस्कृति के धार्मिक ग्रंथों में गणेश जी को प्रथम पूज्य देव का स्थान प्राप्त है। प्रत्येक आध्यात्मिक एवं धार्मिक अनुष्ठान में सर्वप्रथम गणेश जी की आराधना का विधान है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का जन्म दिवस माना गया है। इस बार यह पावन पर्व 14 सितम्बर को आरम्भ हो रहा है। दस दिन तक चलने वाले इस पर्व का समापन अनंत चतुर्दशी के अवसर पर होता है। गणपति जी प्रत्येक भारतीय जनमानस की आत्मा में बसे हुए हैं इसलिए गांव-देहात में रहने वाला साधारण मनुष्य भी अपने प्रत्येक कार्य का शुभारंभ गणेश जी के नाम स्मरण से करता है। वैसे तो प्रतिदिन ही भगवान गणेश की पूजा की जाती है लेकिन भाद्रपद मास में इस पावन पर्व पर गणपति की उपासना अत्यंत शुभ एवं मंगलकारी मानी गई है।
गणेश जी शौर्य, साहस तथा नेतृत्व के परिचायक हैं। पुनीत मन से की गई भगवान गणेश की आराधना भक्त को बुद्धि, विवेक और ज्ञान प्रदान करती है। जीवन तथा कार्य पथ पर आने वाली विभिन्न बाधाओं और दुखों को दूर करने के लिए गणपति की उपासना अंत:करण में एक विशेष शक्ति प्रदान करती है इसलिए हमारे शास्त्रों में गणेश जी को विघ्नहर्ता, मंगल मूर्ति तथा सिद्धिदायक कहा गया है। इस धार्मिक अनुष्ठान में गणेश जी का पूजन-अर्चन हमारे जीवन में आने वाले सभी विघ्नों और बाधाओं को दूर करके सिद्धि, मंगल तथा शुभता प्रदान करता है। गणेश जी, लक्ष्मी जी एवं सरस्वती जी के साथ पूजे जाते हैं। उन्होंने दोनों को आदर्श रूप में समन्वित कर रखा है। ऋद्धि-सिद्धि के कारण उन्हें संपत्ति का अधिपति भी माना जाता है। इस प्रकार उन्हें विद्या बुद्धि और संपत्ति का दाता स्वीकार किया गया है।

10 दिन तक क्यों मनाया जाता है गणेश चतुर्थी का पर्व
महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत जैसे ग्रंथ की रचना गणेश जी के सहयोग से की। दस दिन तक चलने वाले इस गणेश उत्सव के पीछे पौराणिक कथा है कि वेदव्यास जी ने गणेश जी से महाभारत ग्रंथ लिखने की प्रार्थना की। गणेश जी ने बिना रुके लगातार दस दिन में इस विशाल ग्रंथ को लिखा। इसलिए उनके ज्ञान, विवेक और कौशल को नमन करने के लिए यह उत्सव दस दिन तक चलता है।
गणेश जी से प्रेरणा
गणेश जी के शरीर की विचित्र आकृति हमें अनेक प्रतीकात्मक अर्थों के माध्यम से प्रेरणा प्रदान करती है। उनका ‘बड़ा मस्तक’ विशाल बुद्धि, ज्ञान और व्यापक सोच का प्रतीक है। यह हमें हमेशा खुले मन से विचार करने और ज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। उनके ‘बड़े-बड़े कान’ इस बात के परिचायक हैं कि वे सबकी प्रार्थना सुनते हैं। ये सीख देते हैं कि जीवन में बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार ध्यान से सुनना होता है। उनकी ‘छोटी-छोटी आंखें’ एकाग्रता और दूरदर्शिता की प्रतीक मानी जाती हैं। वे लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखने और परिस्थितियों को गहराई से समझने की प्रेरणा देती हैं। गणेश जी की ‘लंबी सूंड’ उनकी कार्यकुशलता और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता की प्रतीक है। उनका ‘एकदंत’ त्याग, दृढ़ संकल्प और बुराई को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का संदेश देता है। उनका ‘अंकुश’ मन और इंद्रियों को नियंत्रित रखने की प्रेरणा देता है, जबकि ‘पाश’ आसक्ति और नकारात्मक बंधनों पर नियंत्रण का संदेश देता है।
गणेश जी की ‘चूहे की सवारी’ भी बेहद प्रतीकात्मक है। यह छोटे प्राणियों के महत्व को परिलक्षित करती है। इस तरह गणेश जी का स्वरूप केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, एकाग्रता, संयम, विनम्रता और जीवन में संतुलन बनाए रखने की सीख भी देता है। जिस मनुष्य में गणपति जैसे ये दिव्य गुण होते हैं, वह जीवन में सदैव अग्रणी तथा वंदनीय बनता है। यह उत्सव केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं अपितु सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस विनायक चतुर्थी को लोग पूरी आस्था और भव्यता के साथ मनाते हैं। घरों में गणपति की मूर्ति की स्थापना की जाती है तथा विधि-विधान से उसका पूजा-अर्चन किया जाता है।
राष्ट्रभक्त बाल गंगाधर तिलक जी ने ही सर्वप्रथम 1893 में गणेश चतुर्थी के इस उत्सव को आधुनिक सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया तथा लोगों में अंग्रेजों के विरुद्ध सामाजिक एकता के मार्ग को प्रशस्त करके लोगों को पुन: अपनी सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक धरोहर के साथ जोड़ा था। महाराष्ट्र के लोगों में यही गणपति उत्सव राष्ट्रीय एकता तथा चेतना का आधार बना था। यह उत्सव हमें आत्मसुधार की ओर प्रेरित करता है। इस पावन उत्सव में विधि-विधान से पवित्र तन-मन से की गई साधना हमें ईश्वरीय ऊर्जा से जुडऩे का अवसर प्रदान करती है।

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