Mahesh Navami 2026: महेश नवमी पर सिर्फ एक पाठ से दूर होंगे जन्म-जन्मांतर के पाप
punjabkesari.in Tuesday, Jun 23, 2026 - 12:01 PM (IST)
Mahesh Navami 2026: आज, 23 जून 2026 को संपूर्ण भारतवर्ष में महेश नवमी का पावन पर्व पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को समर्पित यह दिन साक्षात भगवान शिव (महेश) और माता पार्वती की अनन्य आराधना का विशेष अवसर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन देवों के देव महादेव के आशीर्वाद से माहेश्वरी समाज का प्राकट्य हुआ था, जो इस दिन की महिमा को और भी बढ़ा देता है। माना जाता है कि आज के दिन जो भक्त सच्चे मन से शिव-शक्ति की शरण में आते हैं, उनके जीवन से दुखों के बादल छंट जाते हैं और परिवार में सुख, शांति तथा अटूट समृद्धि का वास होता है।
Mahesh Navami 2026: कैसे शिव के आशीर्वाद से उदय हुआ माहेश्वरी समाज? जानें पौराणिक कथा

शिव-शक्ति के आशीर्वाद से दूर होंगे संकट
महेश नवमी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा का विधान है। माना जाता है कि जो भक्त आज के दिन सच्चे मन से शिव-शक्ति की आराधना करते हैं, उनके जीवन से सभी प्रकार के कष्ट और संकट दूर हो जाते हैं। धर्मग्रंथों के मतानुसार भोलेनाथ ऐसे देवता हैं, जो भक्तों को मनभावन लाभ व सुख देते हैं। शिव स्वयं काल के स्वामी हैं। शिव पूजन चाहे घर में करें या मंदिर में जब भी करें उसके बाद शिव चालीसा और आरती करें।
महेश नवमी पूजा विधि
आज शाम शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाएं। इसके बाद दूध, दही, शहर और जल अर्पित करें। फिर भगवान शिव को चंदन का तिलक, अक्षत, भस्म आदि अर्पित करें। फिर शमी के पत्ते, बेलपत्र, रुद्राक्ष आदि चढ़ाएं। घी का दीपक जलाकर शिव चालीसा पढ़ें और उसके बाद शिव आरती के साथ पूजा को संपन्न करें।
विशेष फलदायी है शिव चालीसा और आरती
शास्त्रों के अनुसार, महेश नवमी पर घर में शिव चालीसा और शिव आरती करना विशेष पुण्यकारी होता है। शिव चालीसा और आरती के प्रभाव से जीवन में सौभाग्य, आरोग्य, सुख-शांति, धन, वैभव और प्रेम की वृद्धि होती है। साथ ही साथ कर्ज से मुक्ति मिलती है व जीवन की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

शिव चालीसा-
।। दोहा ।।
श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
सुख शांति के लिए
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
शत्रु नाश के लिए
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
परिवार में प्रेम के लिए
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
संकट नाश के लिए
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
कृपा प्राप्ति के लिए
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
रोग दोष निवारण के लिए
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
इच्छित वरदान के लिए
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट व्यक्ति और विचारों से बचने के लिए
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
भारी संकट नाश के लिए
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन प्राप्ति के लिए
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ऋण मुक्ति के लिए
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
संतान प्राप्ति के लिए
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
भगवान शिव की आरती
जय शिव ओंकारा ऊं जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अद्र्धांगी धारा॥ ऊं जय शिव...॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ऊं जय शिव...॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ऊं जय शिव...॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ऊं जय शिव...॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ऊं जय शिव...॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ऊं जय शिव...॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥ ऊं जय शिव...॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥ ऊं जय शिव...॥
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ऊं जय शिव...॥

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